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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/166/4
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ ये रजां॑सि॒ तवि॑षीभि॒रव्य॑त॒ प्र व॒ एवा॑स॒: स्वय॑तासो अध्रजन्। भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि ह॒र्म्या चि॒त्रो वो॒ याम॒: प्रय॑तास्वृ॒ष्टिषु॑ ॥

आ । ये । रजां॑सि । तवि॑षीभिः । अव्य॑त । प्र । वः॒ । एवा॑सः । स्वऽय॑तासः । अ॒ध्र॒ज॒न् । भय॑न्ते । विश्वा॑ । भुव॑नानि । ह॒र्म्या । चि॒त्रः । वः॒ । यामः॑ । प्रऽय॑तासु । ऋ॒ष्टिषु॑ ॥

Mantra without Swara
आ ये रजांसि तविषीभिरव्यत प्र व एवास: स्वयतासो अध्रजन्। भयन्ते विश्वा भुवनानि हर्म्या चित्रो वो याम: प्रयतास्वृष्टिषु ॥

आ। ये। रजांसि। तविषीभिः। अव्यत। प्र। वः। एवासः। स्वऽयतासः। अध्रजन्। भयन्ते। विश्वा। भुवनानि। हर्म्या। चित्रः। वः। यामः। प्रऽयतासु। ऋष्टिषु ॥ १.१६६.४

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (ये) जो (वः) तुम्हारे (एवासः) गमनशील (स्वयतासः) अपने बल से नियम को प्राप्त अर्थात् अश्वादि के विना आप ही गमन करने में सन्नद्ध रथ (तविषीभिः) बलों के साथ (रजांसि) लोकों को (आ, अव्यत) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं वे (प्र, अध्रजन्) अत्यन्त धावते हैं, उनके धावन में (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक (हर्म्या) उत्तमोत्तम घर (भयन्ते) काँपते हैं इस कारण (प्रयतासु) नियत (ऋष्टिषु) प्राप्तियों में (चित्रः) अद्भुत (वः) तुम्हारा (यामः) पहुँचना है ॥ ४ ॥
Essence
विद्वान् जन निज शास्त्रीय अद्भुत बल से रथादि बना के नियत वृत्तियों में जा आकर सत्य विद्या पढ़ाने और उनके उपदेशों से सब मनुष्यों को पाल के असत्य विद्या के उपदेशों को निवृत्त करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।