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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/166/3
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यस्मा॒ ऊमा॑सो अ॒मृता॒ अरा॑सत रा॒यस्पोषं॑ च ह॒विषा॑ ददा॒शुषे॑। उ॒क्षन्त्य॑स्मै म॒रुतो॑ हि॒ता इ॑व पु॒रू रजां॑सि॒ पय॑सा मयो॒भुव॑: ॥

यस्मै॑ । ऊमा॑सः । अ॒मृताः॑ । अरा॑सत । रा॒यः । पोष॑म् । च॒ । ह॒विषा॑ । द॒दा॒शुषे॑ । उ॒क्षन्ति॑ । अ॒स्मै॒ । म॒रुतः॑ । हि॒ताःऽइ॑व । पु॒रु । रजां॑सि । पय॑सा । म॒यः॒ऽभुवः॑ ॥

Mantra without Swara
यस्मा ऊमासो अमृता अरासत रायस्पोषं च हविषा ददाशुषे। उक्षन्त्यस्मै मरुतो हिता इव पुरू रजांसि पयसा मयोभुव: ॥

यस्मै। ऊमासः। अमृताः। अरासत। रायः। पोषम्। च। हविषा। ददाशुषे। उक्षन्ति। अस्मै। मरुतः। हिताःऽइव। पुरु। रजांसि। पयसा। मयःऽभुवः ॥ १.१६६.३

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (अमृताः) नाशरहित (ऊमासः) रक्षणादि कर्मवाले आप जैसे (मयोभुवः) सुख की भावना करनेवाले (हिताइव) हित सिद्ध करनेवालों के समान (मरुतः) पवन (अस्मै) इस प्राणी के लिये (पयसा) जल से (पुरु) बहुत (रजांसि) लोकों वा स्थलों को (उक्षन्ति) सींचते हैं वैसे (यस्मै) जिस (ददाशुषे) देनेवाले के लिये (हविषा) विद्यादि देने से (रायः) धर्मयुक्त धन की (पोषम्) पुष्टि को (च) और विद्या को (अरासत) देते हैं वह भी ऐसे ही वर्त्ते ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को वायु के समान सबके सुखों को अच्छे प्रकार विद्या और सत्योपदेश से जल से वृक्षों के समान सींचकर मनुष्यों की वृद्धि करनी चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।