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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/166/2
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
नित्यं॒ न सू॒नुं मधु॒ बिभ्र॑त॒ उप॒ क्रीळ॑न्ति क्री॒ळा वि॒दथे॑षु॒ घृष्व॑यः। नक्ष॑न्ति रु॒द्रा अव॑सा नम॒स्विनं॒ न म॑र्धन्ति॒ स्वत॑वसो हवि॒ष्कृत॑म् ॥

नित्य॑म् । न । सू॒नुम् । मधु॑ । बिभ्र॑तः । उप॑ । क्रीळ॑न्ति । क्री॒ळाः । वि॒दथे॑षु । घृष्व॑यः । नक्ष॑न्ति । रु॒द्राः । अव॑सा । न॒म॒स्विन॑म् । न । म॒र्ध॒न्ति॒ । स्वऽत॑वसः । ह॒विः॒ऽकृत॑म् ॥

Mantra without Swara
नित्यं न सूनुं मधु बिभ्रत उप क्रीळन्ति क्रीळा विदथेषु घृष्वयः। नक्षन्ति रुद्रा अवसा नमस्विनं न मर्धन्ति स्वतवसो हविष्कृतम् ॥

नित्यम्। न। सूनुम्। मधु। बिभ्रतः। उप। क्रीळन्ति। क्रीळाः। विदथेषु। घृष्वयः। नक्षन्ति। रुद्राः। अवसा। नमस्विनम्। न। मर्धन्ति। स्वऽतवसः। हविःऽकृतम् ॥ १.१६६.२

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जो लोग (नित्यम्) नाशरहित जीव के (न) समान (मधु) मधुरादि गुणयुक्त पदार्थ को (बिभ्रतः) धारण करते हुए (सूनुम्) पुत्र के समान (उप, क्रीडन्ति) समीप खेलते हैं वा (विदथेषु) संग्रामों में (घृष्वयः) शत्रु के बल को सहने और (क्रीडाः) खेलनेवाले (नक्षन्ति) प्राप्त होते हैं वा (रुद्रः) प्राणों के समान (अवसा) रक्षा आदि कर्म से (नमस्विनम्) बहुत अन्नयुक्त जन को (न) नहीं (मर्द्धन्ति) लड़ाते और (स्वतवसः) अपना बल पूर्ण रखते हुए (हविष्कृतम्) दानों से सिद्ध किये हुए पदार्थ को रखते हैं उसका नित्य सेवन करो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सबके उपकार में प्राण के समान तृप्ति करने में जल अन्न के समान और आनन्द में सुन्दर लक्षणोंवाली विदुषी के पुत्र के समान वर्त्तमान हैं, वे श्रेष्ठों को बढ़ा और दुष्टों को नमा सकते हैं अर्थात् श्रेष्ठों को उन्नति दे सकते और दुष्टों को नम्र कर सकते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।