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Rigveda Mandal 1 / Sukta 166 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/166/10
Devata- मरुतः Rishi- मैत्रावरुणोऽगस्त्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भूरी॑णि भ॒द्रा नर्ये॑षु बा॒हुषु॒ वक्ष॑स्सु रु॒क्मा र॑भ॒सासो॑ अ॒ञ्जय॑:। अंसे॒ष्वेता॑: प॒विषु॑ क्षु॒रा अधि॒ वयो॒ न प॒क्षान्व्यनु॒ श्रियो॑ धिरे ॥

भूरी॑णि । भ॒द्रा । नर्ये॑षु । बा॒हुषु॑ । वक्षः॑ऽसु । रु॒क्माः । र॒भ॒सासः॑ । अ॒ञ्जयः॑ । अंसे॑षु । एताः॑ । प॒विषु॑ । क्षु॒राः । अधि॑ । वयः॑ । न । प॒क्षान् । वि । अनु॑ । श्रियः॑ । धि॒रे॒ ॥

Mantra without Swara
भूरीणि भद्रा नर्येषु बाहुषु वक्षस्सु रुक्मा रभसासो अञ्जय:। अंसेष्वेता: पविषु क्षुरा अधि वयो न पक्षान्व्यनु श्रियो धिरे ॥

भूरीणि। भद्रा। नर्येषु। बाहुषु। वक्षःऽसु। रुक्माः। रभसासः। अञ्जयः। अंसेषु। एताः। पविषु। क्षुराः। अधि। वयः। न। पक्षान्। वि। अनु। श्रियः। धिरे ॥ १.१६६.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जिनके (नर्येषु) मनुष्यों के लिये हितरूप पदार्थों में (भूरीणि) बहुत (भद्रा) सेवन करने योग्य धर्मयुक्त कर्म वा (बाहुषु) प्रचण्ड भुजदण्डों और (वक्षस्सु) वक्षःस्थलों में (रुक्माः) सुवर्ण और रत्नादियुक्त अलङ्कार (अंसेषु) स्कन्धों में (एताः) विद्या की शिक्षा में प्राप्त (रभसासः) वेग जिनमें विद्यमान ऐसे (अञ्जयः) प्रसिद्ध प्रशंसायुक्त पदार्थ (पविषु, अधि) उत्तम शिक्षायुक्त वाणियों में (क्षुराः) धर्मानुकूल शब्द वर्त्तमान हैं वे (वयः) पखेरू (पक्षान्) पंखों को (न) जैसे वैसे (श्रियः) लक्ष्मियों को (वि, अनु, धिरे) विशेषता से अनुकूल धारण करते हैं ॥ १० ॥
Essence
जो ब्रह्मचर्य से विद्याओं को प्राप्त हुए, गृहाश्रम में आभूषणों को धारण किये पुरुषार्थयुक्त परोपकारी, वानप्रस्थाश्रम में वैराग्य को प्राप्त पढ़ाने में रमे हुए और संन्यास आश्रम में प्राप्त हुआ यथार्थभाव जिनको और परोपकारी सर्वत्र विचरते सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कराते हुए समस्त मनुष्यों को बढ़ाते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।