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Rigveda Mandal 1 / Sukta 165 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/165/9
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अनु॑त्त॒मा ते॑ मघव॒न्नकि॒र्नु न त्वावाँ॑ अस्ति दे॒वता॒ विदा॑नः। न जाय॑मानो॒ नश॑ते॒ न जा॒तो यानि॑ करि॒ष्या कृ॑णु॒हि प्र॑वृद्ध ॥

अनु॑त्तम् । आ । ते॒ । म॒घ॒व॒न् । नकिः॑ । नु । न । त्वाऽवा॑न् । अ॒स्ति॒ । दे॒वता॑ । विदा॑नः । न । जाय॑मानः । नश॑ते । न । जा॒तः । यानि॑ । क॒रि॒ष्या । कृ॒णु॒हि । प्र॒ऽवृ॒द्धः॒ ॥

Mantra without Swara
अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावाँ अस्ति देवता विदानः। न जायमानो नशते न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध ॥

अनुत्तम्। आ। ते। मघवन्। नकिः। नु। न। त्वाऽवान्। अस्ति। देवता। विदानः। न। जायमानः। नशते। न। जातः। यानि। करिष्या। कृणुहि। प्रऽवृद्धः ॥ १.१६५.९

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) परमधनवान् विद्वान् ! (ते) आपका (अनुत्तम्) न प्रेरणा किया हुआ (नकिः) नहीं कोई विद्यमान है और (त्वावान्) तुम्हारे सदृश और (देवता) दिव्य गुणवाला (विदानः) विद्वान् (न) नहीं (अस्ति) है। तथा (जायमानः) उत्पन्न होनेवाला (नु) शीघ्र (न) नहीं (नशते) नष्ट होता (जातः) उत्पन्न हुआ भी (न) नहीं नष्ट होता। हे (प्रवृद्ध) अत्यन्त विद्या से प्रतिष्ठा को प्राप्त आप (यानि) जो (करिष्या) करने योग्य काम हैं उनको शीघ्र (आ कृणुहि) अच्छे प्रकार करिये ॥ ९ ॥
Essence
जैसे अन्तर्यामी ईश्वर से अव्याप्त कुछ भी नहीं विद्यमान है, न कोई उसके सदृश उत्पन्न होता न उत्पन्न हुआ और न होगा न वह नष्ट होता है किन्तु ईश्वरभाव से अपने कर्त्तव्य कामों को करता है, वैसे ही विद्वानों को होना और जानना चाहिये ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।