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Rigveda Mandal 1 / Sukta 165 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/165/4
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब्रह्मा॑णि मे म॒तय॒: शं सु॒तास॒: शुष्म॑ इयर्ति॒ प्रभृ॑तो मे॒ अद्रि॑:। आ शा॑सते॒ प्रति॑ हर्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ अच्छ॑ ॥

ब्रह्मा॑णि । मे॒ । म॒तयः॑ । शम् । सु॒तासः॑ । शुष्मः॑ । इ॒य॒र्ति॒ । प्रऽभृ॑तः । मे॒ । अद्रिः॑ । आ । शा॒स॒ते॒ । प्रति॑ । ह॒र्य॒न्ति॒ । उ॒क्था । इ॒मा । हरी॒ इति॑ । व॒ह॒तः॒ । ता । नः॒ । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
ब्रह्माणि मे मतय: शं सुतास: शुष्म इयर्ति प्रभृतो मे अद्रि:। आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ ॥

ब्रह्माणि। मे। मतयः। शम्। सुतासः। शुष्मः। इयर्ति। प्रऽभृतः। मे। अद्रिः। आ। शासते। प्रति। हर्यन्ति। उक्था। इमा। हरी इति। वहतः। ता। नः। अच्छ ॥ १.१६५.४

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (प्रभृतः) शास्त्रविज्ञान से भरा हुआ (शुष्मः) बलवान् (अद्रिः) मेघ के समान (मे) मेरा उपदेश सबको (इयर्त्ति) प्राप्त होता, वा जैसे (सुतासः) प्राप्त हुए (मतयः) मननशील मनुष्य (मे) मेरे (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों को और (शम्) सुख को (आशासते) चाहते हैं, वा (इमा) इन (उक्था) कहने के योग्य पदार्थों की (प्रति, हर्यन्ति) प्रीति से कामना करते हैं, वा जैसे (ता) वे (हरी) धारण-आकर्षण गुण (नः) हम लोगों को (अच्छ) अच्छा (वहतः) प्राप्त होते हैं, वैसे तुम सब होओ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो उदार हैं वे मेघ के समान सबके लिये समान सुखों को वर्षाते हैं, सबके लिये विद्यादान की कामना करते हैं। जैसे अपने को सुख की इच्छा करते हैं वैसे औरों को सुख करने और दुःखों का विनाश करने को सब चाहैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।