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Rigveda Mandal 1 / Sukta 165 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/165/2
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कस्य॒ ब्रह्मा॑णि जुजुषु॒र्युवा॑न॒: को अ॑ध्व॒रे म॒रुत॒ आ व॑वर्त। श्ये॒नाँ इ॑व॒ ध्रज॑तो अ॒न्तरि॑क्षे॒ केन॑ म॒हा मन॑सा रीरमाम ॥

कस्य॑ । ब्रह्मा॑णि । जु॒जु॒षुः॒ । युवा॑नः । कः । अ॒ध्व॒रे । म॒रुतः॑ । आ । व॒व॒र्त॒ । श्ये॒नान्ऽइ॑व । ध्रज॑तः । अ॒न्तरि॑क्षे । केन॑ । म॒हा । मन॑सा । री॒र॒मा॒म॒ ॥

Mantra without Swara
कस्य ब्रह्माणि जुजुषुर्युवान: को अध्वरे मरुत आ ववर्त। श्येनाँ इव ध्रजतो अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम ॥

कस्य। ब्रह्माणि। जुजुषुः। युवानः। कः। अध्वरे। मरुतः। आ। ववर्त। श्येनान्ऽइव। ध्रजतः। अन्तरिक्षे। केन। महा। मनसा। रीरमाम ॥ १.१६५.२

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (मरुतः) पवनों के समान वेगयुक्त (युवानः) ब्रह्मचर्य और विद्या से युवावस्था को प्राप्त विद्वान् (कस्य) किसके (ब्रह्माणि) वृद्धि को प्राप्त होते जो अन्न वा धन उनको (जुजुषुः) सेवते हैं और (कः) कौन इस (अध्वरे) न नष्ट करने योग्य धर्मयुक्त व्यवहार में (आ, ववर्त्त) अच्छे प्रकार वर्त्तमान है, हम लोग (केन) कौन (महा) बड़े (मनसा) मन से (ध्रजतः) जानेवाले (श्येनानिव) घोड़ों के समान किनको लेकर (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (रीरमाम) सबको रमावें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वायु संसारस्थ पदार्थों को सेवन करते हैं, वैसे ब्रह्मचर्य और विद्या के बोध से परम श्री को सेवें। जैसे अन्तरिक्ष में उड़ते हुए श्येनादि पक्षियों को देखते हैं, वैसे ही भूगोल के साथ हम लोग आकाश में रमें और सबको रमावें, इसको विद्वान् ही जान सकते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।