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Rigveda Mandal 1 / Sukta 165 / Mantra 14

191 Sukta
15 Mantra
1/165/14
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ यद्दु॑व॒स्याद्दु॒वसे॒ न का॒रुर॒स्माञ्च॒क्रे मा॒न्यस्य॑ मे॒धा। ओ षु व॑र्त्त मरुतो॒ विप्र॒मच्छे॒मा ब्रह्मा॑णि जरि॒ता वो॑ अर्चत् ॥

आ । यत् । दु॒व॒स्यात् । दु॒वसे॑ । न । का॒रुः । अ॒स्मान् । च॒क्रे । मा॒न्यस्य॑ । मे॒धा । ओ इति॑ । सु । व॒र्त्त॒ । म॒रु॒तः॒ । विप्र॑म् । अच्छ॑ । इ॒मा । ब्रह्मा॑णि । ज॒रि॒ता । वः॒ । अ॒र्च॒त् ॥

Mantra without Swara
आ यद्दुवस्याद्दुवसे न कारुरस्माञ्चक्रे मान्यस्य मेधा। ओ षु वर्त्त मरुतो विप्रमच्छेमा ब्रह्माणि जरिता वो अर्चत् ॥

आ। यत्। दुवस्यात्। दुवसे। न। कारुः। अस्मान्। चक्रे। मान्यस्य। मेधा। ओ इति। सु। वर्त्त। मरुतः। विप्रम्। अच्छ। इमा। ब्रह्माणि। जरिता। वः। अर्चत् ॥ १.१६५.१४

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) विद्वानो ! (यत्) जिस कारण (दुवस्यात्) सेवन करनेवाले से (दुवसे) सेवन करनेवाले अर्थात् एक से अधिक दूसरे के लिये जैसे (न) वैसे हम लोगों के लिये प्राप्त हुई (मान्यस्य) मानने योग्य योग्यता को प्राप्त सज्जन की (कारुः) शिल्प कार्यों को सिद्ध करनेवाली (मेधा) बुद्धि (अस्मान्) हम लोगों को (आ, चक्रे) करती है अर्थात् शिल्पकार्यों में निपुण करती है इससे तुम (विप्रम्) मेधावी धीरबुद्धिवाले पुरुष के (ओ, षु, वर्त्त) सम्मुख वर्त्तमान होओ, किसलिये (जरिता) स्तुति करनेवाला (इमा) इन (ब्रह्माणि) वेदों को संग्रह कर (अच्छ) अच्छे प्रकार (वः) तुम लोगों को (अर्चत) सेवे ॥ १४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शिल्पीजन शिल्पविद्या से सिद्ध की हुई वस्तुओं का सेवन करते हैं, वैसे वेदार्थ और वेदज्ञान सबको सेवने चाहिये, जिस कारण वेदविद्या के विना अतीव सत्कार करने योग्य विद्वान् नहीं होता ॥ १४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।