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Rigveda Mandal 1 / Sukta 165 / Mantra 11

191 Sukta
15 Mantra
1/165/11
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अम॑न्दन्मा मरुत॒: स्तोमो॒ अत्र॒ यन्मे॑ नर॒: श्रुत्यं॒ ब्रह्म॑ च॒क्र। इन्द्रा॑य॒ वृष्णे॒ सुम॑खाय॒ मह्यं॒ सख्ये॒ सखा॑यस्त॒न्वे॑ त॒नूभि॑: ॥

अम॑न्दत् । मा॒ । म॒रु॒तः॒ । स्तोमः॑ । अत्र॑ । यत् । मे॒ । न॒रः॒ । श्रुत्य॑म् । ब्रह्म॑ । च॒क्र । इन्द्रा॑य । वृष्णे॑ । सुऽम॑खाय । मह्य॑म् । सख्ये॑ । सखा॑यः । त॒न्वे॑ । त॒नूभिः॑ ॥

Mantra without Swara
अमन्दन्मा मरुत: स्तोमो अत्र यन्मे नर: श्रुत्यं ब्रह्म चक्र। इन्द्राय वृष्णे सुमखाय मह्यं सख्ये सखायस्तन्वे तनूभि: ॥

अमन्दत्। मा। मरुतः। स्तोमः। अत्र। यत्। मे। नरः। श्रुत्यम्। ब्रह्म। चक्र। इन्द्राय। वृष्णे। सुऽमखाय। मह्यम्। सख्ये। सखायः। तन्वे। तनूभिः ॥ १.१६५.११

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) विद्वानो ! जैसे (मे) मेरे लिये (यत्) जो (श्रुत्यम्) सुनने योग्य (ब्रह्म) वेद और (स्तोमः) स्तुतिसमूह है वह (अत्र) यहाँ (मा) मुझे (अमन्दत्) आनन्दित करे वैसे तुमको भी आनन्दित करावे। हे (नरः) अग्रगामी मुखिया जनो ! जैसे तुम (सुमखाय) उत्तम यज्ञानुष्ठान करनेवाले (वृष्णे) बलवान् (इन्द्राय) विद्या से प्रकाशित (सख्ये) सबके मित्र (मह्यम्) मेरे लिये (सखायः) सबके सुहृद् होते हुए (तनूभिः) शरीरों के साथ मेरे (तन्वे) शरीर के लिये सुख (चक्र) करो वैसे मैं भी आपके लिये इसको करूँ ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् जन जैसे पढ़े और शब्दार्थ सम्बन्ध से जाने हुए वेद पढ़नेवाले के आत्मा को सुख देते हैं, वैसे ही औरों को भी सुखी करेंगे, ऐसा मान के वे अध्यापक शिष्य को पढ़ावें। जैसे आप ब्रह्मचर्य से रोगरहित बलवान् होकर दीर्घजीवी हों, वैसे औरों को भी करें ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।