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Rigveda Mandal 1 / Sukta 165 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/165/10
Devata- इन्द्र: Rishi- अगस्त्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
एक॑स्य चिन्मे वि॒भ्व१॒॑स्त्वोजो॒ या नु द॑धृ॒ष्वान्कृ॒णवै॑ मनी॒षा। अ॒हं ह्यु१॒॑ग्रो म॑रुतो॒ विदा॑नो॒ यानि॒ च्यव॒मिन्द्र॒ इदी॑श एषाम् ॥

एक॑स्य । चि॒त् । मे॒ । वि॒ऽभु । अ॒स्तु॒ । ओजः॑ । या । नु । द॒धृ॒ष्वान् । कृ॒णवै॑ । म॒नी॒षा । अ॒हम् । हि । उ॒ग्रः । म॒रु॒तः॒ । विदा॑नः । यानि॑ । च्यव॑म् । इन्द्रः॑ । इत् । ई॒शे॒ । ए॒षा॒म् ॥

Mantra without Swara
एकस्य चिन्मे विभ्व१स्त्वोजो या नु दधृष्वान्कृणवै मनीषा। अहं ह्यु१ग्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एषाम् ॥

एकस्य। चित्। मे। विऽभु। अस्तु। ओजः। या। नु। दधृष्वान्। कृणवै। मनीषा। अहम्। हि। उग्रः। मरुतः। विदानः। यानि। च्यवम्। इन्द्रः। इत्। ईशे। एषाम् ॥ १.१६५.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
हे (मरुतः) पवनों के समान वर्त्तमान सज्जनो ! जैसे (एकस्य) एक (चित्) ही (मे) मेरे को (विभु) व्यापक (ओजः) बल (अस्तु) हो और (या) जिनको (दधृष्वान्) अच्छे प्रकार सहनेवाला मैं होऊँ वैसे वह बल (हि) निश्चय से तुम्हारा हो और उनका सहन तुम करो। जैसे (अहम्) मैं (मनीषा) बुद्धि से (नु) शीघ्र (कृणवै) विद्या कर सकूँ और (उग्रः) तीव्र (विदानः) विद्वान् (इन्द्र) दुःख का छिन्न-भिन्न करनेवाला होता हुआ (यानि) जिन पदार्थों को (च्यवम्) प्राप्त होऊँ और (एषाम्, इत्) इन्हीं प्राणियों का (ईशे) स्वामी होऊँ वैसे तुम वर्त्तो ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर अनन्त पराक्रमी और व्यापक है, वैसे विद्वान् जन समस्त शास्त्र और धर्मकृत्यों में व्याप्त होवें और न्यायाधीश होकर इन मनुष्यादि के सुखों को संपादन करें ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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