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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 9

191 Sukta
52 Mantra
1/164/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒क्ता मा॒तासी॑द्धु॒रि दक्षि॑णाया॒ अति॑ष्ठ॒द्गर्भो॑ वृज॒नीष्व॒न्तः। अमी॑मेद्व॒त्सो अनु॒ गाम॑पश्यद्विश्वरू॒प्यं॑ त्रि॒षु योज॑नेषु ॥

यु॒क्ता । मा॒ता । आ॒सी॒त् । धु॒रि । दक्षि॑णायाः । अति॑ष्ठत् । गर्भः॑ । वृ॒ज॒नीषु॑ । अ॒न्तरिति॑ । अमी॑मेत् । व॒त्सः । अनु॑ । गाम् । अ॒प॒श्य॒त् । वि॒श्व॒ऽरू॒प्य॑म् । त्रि॒षु । योज॑नेषु ॥

Mantra without Swara
युक्ता मातासीद्धुरि दक्षिणाया अतिष्ठद्गर्भो वृजनीष्वन्तः। अमीमेद्वत्सो अनु गामपश्यद्विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु ॥

युक्ता। माता। आसीत्। धुरि। दक्षिणायाः। अतिष्ठत्। गर्भः। वृजनीषु। अन्तरिति। अमीमेत्। वत्सः। अनु। गाम्। अपश्यत्। विश्वऽरूप्यम्। त्रिषु। योजनेषु ॥ १.१६४.९

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 4

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Meaning
जो (गर्भः) ग्रहण करने के योग्य पदार्थ (वृजनीषु) वर्जनीय कक्षाओं में (अन्तः) भीतर (अतिष्ठत्) स्थिर होता है, जिसके (दक्षिणायाः) दाहिनी (धुरि) धारण करनेवाली धुरि में (माता) पृथिवी (युक्ता) जड़ी हुई (आसीत्) है। और (वत्सः) बछड़ा (गाम्) गौ को जैसे-वैसे (अमीमेत्) प्रक्षेप करता है तथा (त्रिषु) तीन (योजनेषु) बन्धनों में (विश्वरूप्यम्) समस्त पदार्थों में हुए भाव को (अन्वपश्यत्) अनुकूलता से देखता है वह पदार्थविद्या के जानने को योग्य है ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गर्भरूप मेघ चलते हुए बद्दलों में विराजमान है, वैसे सबको मान्य देनेवाली भूमि आकर्षणों में युक्त है। जैसे बछड़ा गौ के पीछे जाता है, वैसे यह भूमि सूर्य का अनुभ्रमण करती है, जिसमें समस्त सुपेद, हरे, पीले, लाल आदि रूप हैं, वही सबका पालन करनेवाली है ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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