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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 8

191 Sukta
52 Mantra
1/164/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा॒ता पि॒तर॑मृ॒त आ ब॑भाज धी॒त्यग्रे॒ मन॑सा॒ सं हि ज॒ग्मे। सा बी॑भ॒त्सुर्गर्भ॑रसा॒ निवि॑द्धा॒ नम॑स्वन्त॒ इदु॑पवा॒कमी॑युः ॥

मा॒ता । पि॒तर॑म् । ऋ॒ते । आ । ब॒भा॒ज॒ । धी॒ती । अग्रे॑ । मन॑सा । सम् । हि । ज॒ग्मे । सा । बी॒भ॒त्सुः । गर्भ॑ऽरसा । निऽवि॑द्धा । नम॑स्वन्तः । इत् । उ॒प॒ऽवा॒कम् । ई॒युः॒ ॥

Mantra without Swara
माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे। सा बीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नमस्वन्त इदुपवाकमीयुः ॥

माता। पितरम्। ऋते। आ। बभाज। धीती। अग्रे। मनसा। सम्। हि। जग्मे। सा। बीभत्सुः। गर्भऽरसा। निऽविद्धा। नमस्वन्तः। इत्। उपऽवाकम्। ईयुः ॥ १.१६४.८

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(बीभत्सुः) जो भयङ्कर (गर्भरसा) जिसके गर्भ में रसरूप विद्यमान (निविद्धा) निरन्तर बँधी हुई (सा) वह (माता) पृथिवी (धीती) धारण से (अग्रे) सृष्टि के पूर्व (पितरम्) सूर्य के (ऋते) विना सबका (आ, बभाज) अच्छे प्रकार सेवन करती है जिसको (हि) निश्चय के साथ (मनसा) विज्ञान से (सं, जग्मे) सङ्गत होते प्राप्त होते उसको प्राप्त होकर (नमस्वन्तः) प्रशंसित अन्नयुक्त होकर (इत्) ही (उपवाकम्) जिसमें वचन मिलता उस भाग को (ईयुः) प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥
Essence
यदि सूर्य के विना पृथिवी हो तो अपनी शक्ति से सबको क्यों न धारण करे ? जो पृथिवी न हो तो सूर्य आप ही प्रकाशमान कैसे न हो ? इस कारण इस सृष्टि में अपने-अपने स्वभाव से सब पदार्थ स्वतन्त्र हैं और सापेक्ष व्यवहार में परतन्त्र भी हैं ॥ ८ ॥
Subject
अब सूर्यादिकों की कार्य-कारण व्यवस्था को अगले मन्त्र में कहते हैं ।