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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 5

191 Sukta
52 Mantra
1/164/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पाक॑: पृच्छामि॒ मन॒सावि॑जानन्दे॒वाना॑मे॒ना निहि॑ता प॒दानि॑। व॒त्से ब॒ष्कयेऽधि॑ स॒प्त तन्तू॒न्वि त॑त्रिरे क॒वय॒ ओत॒वा उ॑ ॥

पाकः॑ । पृ॒च्छा॒मि॒ । मन॑सा । अवि॑ऽजानन् । दे॒वाना॑म् । ए॒ना । निऽहि॑ता । प॒दानि॑ । व॒त्से । ब॒ष्कये॑ । अधि॑ । स॒प्त । तन्तू॑न् । वि । त॒त्नि॒रे॒ । क॒वयः॑ । ओत॒वै । ऊँ॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
पाक: पृच्छामि मनसाविजानन्देवानामेना निहिता पदानि। वत्से बष्कयेऽधि सप्त तन्तून्वि तत्रिरे कवय ओतवा उ ॥

पाकः। पृच्छामि। मनसा। अविऽजानन्। देवानाम्। एना। निऽहिता। पदानि। वत्से। बष्कये। अधि। सप्त। तन्तून्। वि। तत्रिरे। कवयः। ओतवै। ऊँ इति ॥ १.१६४.५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (कवयः) बुद्धिमान् जन (ओतवै) विस्तार के लिये (बष्कये) देखने योग्य (वत्से) सन्तान के निमित्त (सप्त) सात (तन्तून्) विस्तृत धातुओं को (व्यधि, तत्रिरे) अनेक प्रकार से अधिक अधिक विस्तारते हैं (उ) उन्हीं (देवानाम्) दिव्य विद्वानों के (एना) इन (निहिता) स्थापित किये हुए (पदानि) प्राप्त होने वा जानने योग्य पदों को, अधिकारों को (अविजानन्) न जानता हुआ (पाकः) ब्रह्मचर्यादि तपस्या से परिपक्व होने योग्य मैं (मनसा) अन्तःकरण से (पृच्छामि) पूछता हूँ ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि बाल्यावस्था को लेकर अविदित शास्त्रों को विद्वानों से पढ़कर दूसरों को पढ़ाने से सब विद्याओं को फैलावें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।