Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 48

191 Sukta
52 Mantra
1/164/48
Devata- संवत्सरात्मा कालः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्वाद॑श प्र॒धय॑श्च॒क्रमेकं॒ त्रीणि॒ नभ्या॑नि॒ क उ॒ तच्चि॑केत। तस्मि॑न्त्सा॒कं त्रि॑श॒ता न श॒ङ्कवो॑ऽर्पि॒ताः ष॒ष्टिर्न च॑लाच॒लास॑: ॥

द्वाद॑श । प्र॒ऽधयः॑ । च॒क्रम् । एक॑म् । त्रीणि॑ । नभ्या॑नि । कः । ऊँ॒ इति॑ । तत् । चि॒के॒त॒ । तस्मि॑न् । सा॒कम् । त्रि॒ऽश॒ताः । न । श॒ङ्कवः॑ । अ॒र्पि॒ताः । ष॒ष्टिः । न । च॒ला॒च॒लासः॑ ॥

Mantra without Swara
द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत। तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलास: ॥

द्वादश। प्रऽधयः। चक्रम्। एकम्। त्रीणि। नभ्यानि। कः। ऊँ इति। तत्। चिकेत। तस्मिन्। साकम्। त्रिऽशताः। न। शङ्कवः। अर्पिताः। षष्टिः। न। चलाचलासः ॥ १.१६४.४८

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस रथ में (त्रिशता) तीनसौ (शङ्कवः) बाँधनेवाली कीलों के (न) समान (साकम्) साथ (अर्पिताः) लगाई हुई (षष्टिः) साठ कीलों (न) जैसी कीलें जो कि (चलाचलासः) चल-अचल अर्थात् चलती और न चलती और (तस्मिन्) उसमें (एकम्) एक (चक्रम्) पहिया जैसा गोल चक्कर (द्वादश) बारह (प्रधयः) पहिओं की हालें अर्थात् हाल लगे हुए पहिये और (त्रीणि) तीन (नभ्यानि) पहिओं की बीच की नाभियों में उत्तमता में ठहरनेवाली धुरी स्थापित की हों (तत्) उसको (कः) कौन (उ) तर्क-वितर्क से (चिकेत) जाने ॥ ४८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई ही विद्वान् जैसे शरीर-रचना को जानते हैं वैसे विमान आदि यानों को बनाना जानते हैं। जब जल, स्थल और आकाश में शीघ्र जानेके लिये रथों को बनाने की इच्छा होती है तब उनमें अनेक जल अग्नि के चक्कर, अनेक बन्धन, अनेक धारण और कीलें रचनी चाहियें, ऐसा करने से चाही हुई सिद्धि होती है ॥ ४८ ॥
Subject
अब विद्वद्विषय में शिल्प विषय को कहा है ।