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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 45

191 Sukta
52 Mantra
1/164/45
Devata- वाक् Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒त्वारि॒ वाक्परि॑मिता प॒दानि॒ तानि॑ विदुर्ब्राह्म॒णा ये म॑नी॒षिण॑:। गुहा॒ त्रीणि॒ निहि॑ता॒ नेङ्ग॑यन्ति तु॒रीयं॑ वा॒चो म॑नु॒ष्या॑ वदन्ति ॥

च॒त्वारि॑ । वाक् । परि॑ऽमिता । प॒दानि॑ । तानि॑ । विदुः । ब्रा॒ह्म॒णाः । ये । म॒नी॒षिणः॑ । गुहा॑ । त्रीणि॑ । निऽहि॑ता । न । इ॒ङ्ग॒य॒न्ति॒ । तु॒रीय॑म् । वा॒चः । म॒नु॒ष्याः॑ । व॒द॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण:। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥

चत्वारि। वाक्। परिऽमिता। पदानि। तानि। विदुः। ब्राह्मणाः। ये। मनीषिणः। गुहा। त्रीणि। निऽहिता। न। इङ्गयन्ति। तुरीयम्। वाचः। मनुष्याः। वदन्ति ॥ १.१६४.४५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 5

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Meaning
(ये) जो (मनीषिणः) मन को रोकनेवाले (ब्राह्मणाः) व्याकरण, वेद और ईश्वर के जाननेवाले विद्वान् जन (वाक्) वाणी के (परिमिता) परिमाणयुक्त जो (चत्वारि) नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात चार (पदानि) जानने को योग्य पद हैं (तानि) उनको (विदुः) जानते हैं उनमें से (त्रीणि) तीन (गुहा) बुद्धि में (निहिता) धरे हुए हैं (न, इङ्गयन्ति) चेष्टा नहीं करते। जो (मनुष्याः) साधारण मनुष्य हैं, वे (वाचः) वाणी के (तुरीयम्) चतुर्थ भाग अर्थात् निपातमात्र को (वदन्ति) कहते हैं ॥ ४५ ॥
Essence
विद्वान् और अविद्वानों में इतना ही भेद है कि जो विद्वान् हैं, वे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात इन चारों को जानते हैं। उनमें से तीन ज्ञान में रहते हैं, चौथे सिद्ध शब्दसमूह को प्रसिद्ध व्यवहार में सब कहते हैं। और जो अविद्वान् हैं वे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातों को नहीं जानते किन्तु निपातरूप साधन-ज्ञान-रहित प्रसिद्ध शब्द का प्रयोग करते हैं ॥ ४५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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