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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 44

191 Sukta
52 Mantra
1/164/44
Devata- अग्निः सूर्यो वायुश्च Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रय॑: के॒शिन॑ ऋतु॒था वि च॑क्षते संवत्स॒रे व॑पत॒ एक॑ एषाम्। विश्व॒मेको॑ अ॒भि च॑ष्टे॒ शची॑भि॒र्ध्राजि॒रेक॑स्य ददृशे॒ न रू॒पम् ॥

त्रयः॑ । के॒शिनः॑ । ऋ॒तु॒ऽथा । वि । च॒क्ष॒ते॒ । स॒व्ँम्व॒त्स॒रे । व॒प॒ते॒ । एकः॑ । ए॒षा॒म् । विश्व॑म् । एकः॑ । अ॒भि । च॒ष्टे॒ । शची॑भिः । ध्राजिः॑ । एक॑स्य । द॒दृ॒शे॒ । न । रू॒पम् ॥

Mantra without Swara
त्रय: केशिन ऋतुथा वि चक्षते संवत्सरे वपत एक एषाम्। विश्वमेको अभि चष्टे शचीभिर्ध्राजिरेकस्य ददृशे न रूपम् ॥

त्रयः। केशिनः। ऋतुऽथा। वि। चक्षते। सव्ँम्वत्सरे। वपते। एकः। एषाम्। विश्वम्। एकः। अभि। चष्टे। शचीभिः। ध्राजिः। एकस्य। ददृशे। न। रूपम् ॥ १.१६४.४४

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे पढ़ने-पढ़ानेवाले लोगों के परीक्षको ! तुम जैसे (केशिनः) प्रकाशवान् वा अपने गुण को समय पाय जतानेवाले (त्रयः) तीन अर्थात् सूर्य, बिजुली और वायु (संवत्सरे) संवत्सर अर्थात् वर्ष में (ऋतुथा) वसन्तादि ऋतु के प्रकार से (शचीभिः) जो कर्म उनसे (वि, चक्षते) दिखाते अर्थात् समय-समय के व्यवहार को प्रकाशित कराते हैं (एषाम्) इन तीनों में (एकः) एक बिजुलीरूप अग्नि (वपते) बीजों को उत्पन्न कराता (एकः) सूर्य (विश्वम्) समग्र जगत् को (अभि, चष्टे) प्रकाशित करता और (एकस्य) वायु की (ध्राजिः) गति और (रूपम्) रूप (न) नहीं (ददृशे) दीखता वैसे तुम यहाँ प्रवर्त्तमान होओ ॥ ४४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम वायु, सूर्य और बिजुली के समान अध्ययन-अध्यापन आदि कार्मों से विद्याओं को बढ़ाओ। जैसे अपने आत्मा का रूप नेत्र से नहीं दीखता वैसे विद्वानों की गति नहीं जानी जाती। जैसे ऋतु संवत्सर को आरम्भ करते हुए समय को विभाग करते हैं, वैसे कर्म्मारम्भ विद्या-अविद्या और धर्म्म-अधर्म्म को पृथक्पृथक् करें ॥ ४४ ॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।