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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 43

191 Sukta
52 Mantra
1/164/43
Devata- शकधूमः, सोमः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श॒क॒मयं॑ धू॒ममा॒राद॑पश्यं विषू॒वता॑ प॒र ए॒नाव॑रेण। उ॒क्षाणं॒ पृश्नि॑मपचन्त वी॒रास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन् ॥

श॒क॒ऽमय॑म् । धू॒मम् । आ॒रात् । अ॒प॒श्य॒म् । वि॒षु॒ऽवता॑ । प॒रः । ए॒ना । अव॑रेण । उ॒क्षाण॑म् । पृश्नि॑म् । अ॒प॒च॒न्त॒ । वी॒राः । तानि॑ । धर्मा॑णि । प्र॒थ॒मानि॑ । आ॒स॒न् ॥

Mantra without Swara
शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एनावरेण। उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ॥

शकऽमयम्। धूमम्। आरात्। अपश्यम्। विषुऽवता। परः। एना। अवरेण। उक्षाणम्। पृश्निम्। अपचन्त। वीराः। तानि। धर्माणि। प्रथमानि। आसन् ॥ १.१६४.४३

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! मैं (आरात्) समीप से (शकमयम्) शक्तिमय समर्थ (धूमम्) ब्रह्मचर्य कर्मानुष्ठान के अग्नि के धूम को (अपश्यम्) देखता हूँ (एना, अवरेण) इस नीचे इधर-उधर जाते हुए (विषूवता) व्याप्तिमान् धूम से (परः) पीछे (वीराः) विद्याओं में व्याप्त पूर्ण विद्वान् (पृश्निम्) आकाश और (उक्षाणम्) सींचनेवाले मेघ को (अपचन्त) पचाते अर्थात् ब्रह्मचर्यविषयक अग्निहोत्राग्नि तपते हैं (तानि) वे (धर्माणि) धर्म (प्रथमानि) प्रथम ब्रह्मचर्यसञ्ज्ञक (आसन्) हुए हैं ॥ ४३ ॥
Essence
विद्वान् जन अग्निहोत्रादि यज्ञों से मेघमण्डलस्थ जल को शुद्ध कर सब वस्तुओं को शुद्ध करते हैं इससे ब्रह्मचर्य के अनुष्ठान से सबके शरीर, आत्मा और मन को शुद्ध करावें। सब मनुष्यमात्र समीपस्थ धूम और अग्नि वा और पदार्थ को प्रत्यक्षता से देखते हैं और अगले-पिछले भाव को जाननेवाला विद्वान् तो भूमि से लेके परमेश्वरपर्यन्त वस्तुसमूह को साक्षात् कर सकता है ॥ ४३ ॥
Subject
अब ब्रह्मचर्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।