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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 40

191 Sukta
52 Mantra
1/164/40
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सू॒य॒व॒साद्भग॑वती॒ हि भू॒या अथो॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम। अ॒द्धि तृण॑मघ्न्ये विश्व॒दानीं॒ पिब॑ शु॒द्धमु॑द॒कमा॒चर॑न्ती ॥

सु॒य॒व॒स॒ऽअत् । भग॑ऽवती । हि । भू॒याः । अथो॒ इति॑ । व॒यम् । भग॑ऽवन्तः । स्या॒म॒ । अ॒द्धि । तृण॑म् । अ॒घ्न्ये॒ । वि॒श्व॒ऽदानी॑म् । पिब॑ । शु॒द्धम् । उ॒द॒कम् । आ॒ऽचर॑न्ती ॥

Mantra without Swara
सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम। अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥

सुयवसऽअत्। भगऽवती। हि। भूयाः। अथो इति। वयम्। भगऽवन्तः। स्याम। अद्धि। तृणम्। अघ्न्ये। विश्वऽदानीम्। पिब। शुद्धम्। उदकम्। आऽचरन्ती ॥ १.१६४.४०

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अध्न्ये) न हनने योग्य गौ के समान वर्त्तमान विदुषी ! तू (सुयवसात्) सुन्दर सुखों को भोगनेवाली (भगवती) बहुत ऐश्वर्यवती (भूयाः) हो कि (हि) जिस कारण (वयम्) हम लोग (भगवन्तः) बहुत ऐश्वर्ययुक्त (स्याम) हों। जैसे गौ (तृणम्) तृण को खा (शुद्धम्) शुद्ध (उदकम्) जल को पी और दूध देकर बछड़े आदि को सुखी करती है वैसे (विश्वदानीम्) समस्त जिसमें दान उस क्रिया का (आचरन्ती) सत्य आचरण करती हुई (अथो) इसके अनन्तर सुख को (अद्धि) भोग और विद्यारस को (पिब) पी ॥ ४० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जबतक माताजन वेदवित् न हों तबतक उनमें सन्तान भी विद्यावान् नहीं होते हैं। जो विदुषी हो स्वयंवर विवाह कर सन्तानों को उत्पन्न कर उनको अच्छी शिक्षा देकर उन्हें विद्वान् करती हैं, वे गौओं के समान समस्त जगत् को आनन्दित करती हैं ॥ ४० ॥
Subject
अब विदुषी स्त्री के विषय में कहा है ।