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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 39

191 Sukta
52 Mantra
1/164/39
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒चो अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्यस्मि॑न्दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः। यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्वि॒दुस्त इ॒मे समा॑सते ॥

ऋ॒चः । अ॒क्षरे॑ । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् । यस्मि॑न् । दे॒वाः । अधि॑ । विश्वे॑ । नि॒ऽसे॒दुः । यः । तत् । न । वेद॑ । किम् । ऋ॒चा । क॒रि॒ष्य॒ति॒ । ये । इत् । तत् । वि॒दुः । ते । इ॒मे । सम् । आ॒स॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः। यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥

ऋचः। अक्षरे। परमे। विऽओमन्। यस्मिन्। देवाः। अधि। विश्वे। निऽसेदुः। यः। तत्। न। वेद। किम्। ऋचा। करिष्यति। ये। इत्। तत्। विदुः। ते। इमे। सम्। आसते ॥ १.१६४.३९

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्मिन्) जिस (ऋचः) ऋग्वेदादि वेदमात्र से प्रतिपादित (अक्षरे) नाशरहित (परमे) उत्तम (व्योमन्) आकाश के बीच व्यापक परमेश्वर में (विश्वे) समस्त (देवाः) पृथिवी सूर्य लोकादि देव (अधि, निषेदुः) आधेयरूप से स्थित होते हैं। (यः) जो (तत्) उस परब्रह्म परमेश्वर को (न, वेद) नहीं जानता वह (ऋचा) चार वेद से (किम्) क्या (करिष्यति) कर सकता है और (ये) जो (तत्) उस परब्रह्म को (विदुः) जानते हैं (ते) (इमे, इत्) वे ही ये ब्रह्म में (समासते) अच्छे प्रकार स्थिर होते हैं ॥ ३९ ॥
Essence
जो सब वेदों का परमप्रमेय पदार्थरूप और वेदों से प्रतिपाद्य ब्रह्म अमर और जीव तथा कार्यकारणरूप जगत् है, इन सभों में से सबका आधार अर्थात् ठहरने का स्थान आकाशवत् परमात्मा व्यापक और जीव तथा कार्य कारणरूप जगत् व्याप्य है, इसीसे सब जीव आदि पदार्थ परमेश्वर में निवास करते हैं। और जो वेदों को पढ़के इस प्रमेय को नहीं जानते, वे वेदों से कुछ भी फल नहीं पाते और जो वेदों को पढ़के जीव, कार्य, कारण और ब्रह्म को गुण, कर्म, स्वभाव से जानते हैं, वे सब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्ध होते आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥ ३९ ॥
Subject
फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।