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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 36

191 Sukta
52 Mantra
1/164/36
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒प्तार्ध॑ग॒र्भा भुव॑नस्य॒ रेतो॒ विष्णो॑स्तिष्ठन्ति प्र॒दिशा॒ विध॑र्मणि। ते धी॒तिभि॒र्मन॑सा॒ ते वि॑प॒श्चित॑: परि॒भुव॒: परि॑ भवन्ति वि॒श्वत॑: ॥

स॒प्त । अ॒र्ध॒ऽग॒र्भाः । भुव॑नस्य । रेतः॑ । विष्णोः॑ । ति॒ष्ठ॒न्ति॒ । प्र॒ऽदिशा॑ । विऽध॑र्मणि । ते । धी॒तिऽभिः॑ । मन॑सा । ते । वि॒पः॒ऽचितः॑ । प॒रि॒ऽभुवः॑ । परि॑ । भ॒व॒न्ति॒ । वि॒श्वतः॑ ॥

Mantra without Swara
सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि। ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चित: परिभुव: परि भवन्ति विश्वत: ॥

सप्त। अर्धऽगर्भाः। भुवनस्य। रेतः। विष्णोः। तिष्ठन्ति। प्रऽदिशा। विऽधर्मणि। ते। धीतिऽभिः। मनसा। ते। विपःऽचितः। परिऽभुवः। परि। भवन्ति। विश्वतः ॥ १.१६४.३६

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (सप्त) सात (अर्द्धगर्भाः) आधे गर्भरूप अर्थात् पञ्चीकरण को प्राप्त महत्तत्त्व, अहङ्कार, पृथिवी, अप्, तेज, वायु, आकाश के सूक्ष्म अवयवरूप शरीरधारी (भुवनस्य) संसार के (रेतः) बीज को उत्पन्न कर (विष्णोः) व्यापक परमात्मा की (प्रदिशा) आज्ञा से अर्थात् उसकी आज्ञारूप वेदोक्त व्यवस्था से (विधर्मणि) चेतन से विरुद्ध धर्मवाले आकाश में (तिष्ठन्ति) स्थित होते हैं (ते) वे (धीतिभिः) कर्म और (ते) वे (मनसा) विचार के साथ (परिभुवः) सब ओर से विद्या में कुशल (विपश्चितः) विद्वान् जन (विश्वतः) सब ओर से (परि, भवन्ति) तिरस्कृत करते अर्थात् उनके यथार्थ भाव के जानने को विद्वान् जन भी कष्ट पाते हैं ॥ ३६ ॥
Essence
जो महत्तत्त्व, अहङ्कार, पञ्चसूक्ष्मभूत सात पदार्थ हैं वे पञ्चीकरण को प्राप्त हुए सब स्थूल जगत् के कारण हैं। चेतन से विरुद्ध धर्म्मवाले जड़रूप अन्तरिक्ष में सब वसते हैं। जो यथावत् सृष्टिक्रम को जानते हैं वे विद्वान् जन सब ओर से सत्कार को प्राप्त होते हैं और जो इसको नहीं जानते वे सब ओर से तिरस्कार को प्राप्त होते हैं ॥ ३६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।