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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 32

191 Sukta
52 Mantra
1/164/32
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य ईं॑ च॒कार॒ न सो अ॒स्य वे॑द॒ य ईं॑ द॒दर्श॒ हिरु॒गिन्नु तस्मा॑त्। स मा॒तुर्योना॒ परि॑वीतो अ॒न्तर्ब॑हुप्र॒जा निर्ऋ॑ति॒मा वि॑वेश ॥

यः । ई॒म् । च॒कार॑ । न । सः । अ॒स्य । वे॒द॒ । यः । ई॒म् । द॒दर्श॑ । हिरु॑क् । इत् । नु । तस्मा॑त् । सः । मा॒तुः । योना॑ । परि॑ऽवीतः । अ॒न्तः । ब॒हु॒ऽप्र॒जाः । निःऽऋ॑तिम् । आ । वि॒वे॒श॒ ॥

Mantra without Swara
य ईं चकार न सो अस्य वेद य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात्। स मातुर्योना परिवीतो अन्तर्बहुप्रजा निर्ऋतिमा विवेश ॥

यः। ईम्। चकार। न। सः। अस्य। वेद। यः। ईम्। ददर्श। हिरुक्। इत्। नु। तस्मात्। सः। मातुः। योना। परिऽवीतः। अन्तः। बहुऽप्रजाः। निःऽऋतिम्। आ। विवेश ॥ १.१६४.३२

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो जीव (ईम्) क्रियामात्र (चकार) करता है (सः) वह (अस्य) इस अपने रूप को (न) नहीं (वेद) जानता है (यः) जो (ईम्) समस्त क्रिया को (ददर्श) देखता और अपने रूप को जानता है (सः) वह (तस्मात्) इससे (हिरुक्) अलग होता हुआ (मातुः) माता के (योना) गर्भाशय के (अन्तः) बीच (परिवीतः) सब ओर से ढंपा हुआ (बहुप्रजाः) बहुत बार जन्म लेनेवाला (निर्ऋतिम्) भूमि को (इत्) ही (नु) शीघ्र (आ, विवेश) प्रवेश करता है ॥ ३२ ॥
Essence
जो जीव कर्ममात्र करते किन्तु उपासना और ज्ञान को नहीं प्राप्त होते हैं, वे अपने स्वरूप को भी नहीं जानते। और जो कर्म, उपासना और ज्ञान में निपुण हैं, वे अपने स्वरूप और परमात्मा के जानने को योग्य हैं। जीवों के अगले जन्मों का आदि और पीछे अन्त नहीं है। जब शरीर को छोड़ते हैं तब आकाशस्थ हो गर्भ में प्रवेश कर और जन्म पाकर पृथिवी में चेष्टा क्रियावान् होते हैं ॥ ३२ ॥
Subject
फिर जीव विषयमात्र को कहा है ।