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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 31

191 Sukta
52 Mantra
1/164/31
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अप॑श्यं गो॒पामनि॑पद्यमान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम्। स स॒ध्रीची॒: स विषू॑ची॒र्वसा॑न॒ आ व॑रीवर्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः ॥

अप॑श्यम् । गो॒पाम् । अनि॑ऽपद्यमानम् । आ । च॒ । परा॑ । च॒ । प॒थिऽभिः॑ । चर॑न्तम् । सः । स॒ध्रीचीः॑ । सः । विषू॑चीः । वसा॑नः । आ । व॒री॒व॒र्ति॒ । भुव॑नेषु । अ॒न्तरिति॑ ॥

Mantra without Swara
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्। स सध्रीची: स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥

अपश्यम्। गोपाम्। अनिऽपद्यमानम्। आ। च। परा। च। पथिऽभिः। चरन्तम्। सः। सध्रीचीः। सः। विषूचीः। वसानः। आ। वरीवर्ति। भुवनेषु। अन्तरिति ॥ १.१६४.३१

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 1

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Meaning
मैं (गोपाम्) सबकी रक्षा करने (अनिपद्यमानम्) मन आदि इन्द्रियों को न प्राप्त होने और (पथिभिः) मार्गों से (आ, च) आगे और (परा, च) पीछे (चरन्तम्) प्राप्त होनेवाले परमात्मा वा विचरते हुए जीव को (अपश्यम्) देखता हूँ (सः) वह जीवात्मा (सध्रीचीः) साथ प्राप्त होती हुई गतियों को (सः) वह जीव और (विषूचीः) नाना प्रकार की कर्मानुसार गतियों को (वसानः) ढाँपता हुआ (भुवनेषु) लोकलोकान्तरों के (अन्तः) बीच (आ, वरीवर्त्ति) निरन्तर अच्छे प्रकार वर्त्तमान है ॥ ३१ ॥
Essence
सबके देखनेवाले परमेश्वर के देखने को जीव समर्थ नहीं और परमेश्वर सबको यथार्थ भाव से देखता है। जैसे वस्त्रों आदि से ढंपा हुआ पदार्थ नहीं देखा जाता वैसे जीव भी सूक्ष्म होने से नहीं देखा जाता। ये जीव कर्मगति से सब लोकों में भ्रमते हैं। इनके भीतर-बाहर परमात्मा स्थित हुआ पापपुण्य के फल देनेरूप न्याय से सबको सर्वत्र जन्म देता है ॥ ३१ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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