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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 30

191 Sukta
52 Mantra
1/164/30
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒नच्छ॑ये तु॒रगा॑तु जी॒वमेज॑द्ध्रु॒वं मध्य॒ आ प॒स्त्या॑नाम्। जी॒वो मृ॒तस्य॑ चरति स्व॒धाभि॒रम॑र्त्यो॒ मर्त्ये॑ना॒ सयो॑निः ॥

अ॒नत् । श॒ये॒ । तु॒रऽगा॑तु । जी॒वम् । एज॑त् । ध्रु॒वम् । मध्ये॑ । आ । प॒स्त्या॑नाम् । जी॒वः । मृ॒तस्य॑ । च॒र॒ति॒ । स्व॒धाभिः॑ । अम॑र्त्यः । मर्त्ये॑न । सऽयो॑निः ॥

Mantra without Swara
अनच्छये तुरगातु जीवमेजद्ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम्। जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः ॥

अनत्। शये। तुरऽगातु। जीवम्। एजत्। ध्रुवम्। मध्ये। आ। पस्त्यानाम्। जीवः। मृतस्य। चरति। स्वधाभिः। अमर्त्यः। मर्त्येन। सऽयोनिः ॥ १.१६४.३०

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो ब्रह्म (तुरगातु) शीघ्र गमन को (अनत्) पुष्ट करता हुआ (जीवम्) जीव को (एजत्) कंपाता और (पस्त्यानाम्) घरों के अर्थात् जीवों के शरीर के (मध्ये) बीच (ध्रुवम्) निश्चल होता हुआ (शये) सोता है। जहाँ (अमर्त्यः) अनादित्व से मृत्युधर्मरहित (जीवः) जीव (स्वधाभिः) अन्नादि और (मर्त्येन) मरणधर्मा शरीर के साथ (सयोनिः) एकस्थानी होता हुआ (मृतस्य) मरण स्वभाववाले जगत् के बीच (आ, चरति) आचरण करता है, उस ब्रह्म में सब जगत् वसता है, यह जानना चाहिये ॥ ३० ॥
Essence
इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। जो चलते हुए पदार्थों में अचल, अनित्य पदार्थों में नित्य और व्याप्य पदार्थों में व्यापक परमेश्वर है, उसकी व्याप्ति के विना सूक्ष्म से सूक्ष्म भी वस्तु नहीं है, इससे सब जीवों को जो यह अन्तर्यामिरूप से स्थित हो रहा है, वह नित्य उपासना करने योग्य है ॥ ३० ॥
Subject
फिर ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।