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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 29

191 Sukta
52 Mantra
1/164/29
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒यं स शि॑ङ्क्ते॒ येन॒ गौर॒भीवृ॑ता॒ मिमा॑ति मा॒युं ध्व॒सना॒वधि॑ श्रि॒ता। सा चि॒त्तिभि॒र्नि हि च॒कार॒ मर्त्यं॑ वि॒द्युद्भव॑न्ती॒ प्रति॑ व॒व्रिमौ॑हत ॥

अयम् । सः । शि॒ङ्क्ते॒ । येन॑ । गौः । अ॒भिऽवृ॑ता । मिमा॑ति । मा॒युम् । ध्व॒सनौ॑ । अधि॑ । श्रि॒ता । सा । चि॒त्तिऽभिः॑ । नि । हि । च॒कार॑ । मर्त्य॑म् । वि॒ऽद्युत् । भव॑न्ती । प्रति॑ । व॒व्रिम् । औ॒ह॒त॒ ॥

Mantra without Swara
अयं स शिङ्क्ते येन गौरभीवृता मिमाति मायुं ध्वसनावधि श्रिता। सा चित्तिभिर्नि हि चकार मर्त्यं विद्युद्भवन्ती प्रति वव्रिमौहत ॥

अयम्। सः। शिङ्क्ते। येन। गौः। अभिऽवृता। मिमाति। मायुम्। ध्वसनौ। अधि। श्रिता। सा। चित्तिऽभिः। नि। हि। चकार। मर्त्यम्। विऽद्युत्। भवन्ती। प्रति। वव्रिम्। औहत ॥ १.१६४.२९

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(सः) सो (अयम्) यह बछड़े के समान मेघ भूमि को लख (शिङ्क्ते) गर्जन का अव्यक्त शब्द करता है कौन कि (येन) जिससे (ध्वसनौ) ऊपर, नीचे और बीच में जाने को परकोटा उसमें (अधि, श्रिता) धरी हुई (अभीवृता) सब ओर पवन से आवृत (गौः) पृथिवी (मायुम्) परिमित मार्ग को (प्रति, मिमाति) प्रति जाती है (सा) वह (चित्तिभिः) परमाणुओं के समूहों से (मर्त्यम्) मरणधर्मा मनुष्य को (चकार) करती है उस पृथिवी (हि) ही में (भवन्ती) वर्त्तमान (विद्युत्) बिजुली (वव्रिम्) अपने रूप को (नि, औहत) निरन्तर तर्क-वितर्क से प्राप्त होती है ॥ २९ ॥
Essence
जैसे पृथिवी से उत्पन्न हो उठकर अन्तरिक्ष में बढ़ फैल मेघ पृथिवी में वृक्षादि को अच्छे सींच उनको बढ़ाता है, वैसे पृथिवी सबको बढ़ाती है और पृथिवी में जो बिजुली है वह रूप को प्रकाशित करती। जैसे शिल्पी जन क्रम से किसी पदार्थ के इकट्ठा करने और विज्ञान से घर आदि बनाता है, वैसे परमेश्वर ने यह सृष्टि बनाई है ॥ २९ ॥
Subject
फिर भूमि के विषय में कहा है ।