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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 25

191 Sukta
52 Mantra
1/164/25
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
जग॑ता॒ सिन्धुं॑ दि॒व्य॑स्तभायद्रथंत॒रे सूर्यं॒ पर्य॑पश्यत्। गा॒य॒त्रस्य॑ स॒मिध॑स्ति॒स्र आ॑हु॒स्ततो॑ म॒ह्ना प्र रि॑रिचे महि॒त्वा ॥

जग॑ता । सिन्धु॑म् । दि॒वि । अ॒स्त॒भा॒य॒त् । र॒थ॒म्ऽत॒रे । सूर्य॑म् । परि॑ । अ॒प॒श्य॒त् । गा॒य॒त्रस्य॑ । स॒म्ऽइधः॑ । ति॒स्रः । आ॒हुः॒ । ततः॑ । म॒ह्रा । प्र । रि॒रि॒चे॒ । म॒हि॒ऽत्वा ॥

Mantra without Swara
जगता सिन्धुं दिव्यस्तभायद्रथंतरे सूर्यं पर्यपश्यत्। गायत्रस्य समिधस्तिस्र आहुस्ततो मह्ना प्र रिरिचे महित्वा ॥

जगता। सिन्धुम्। दिवि। अस्तभायत्। रथम्ऽतरे। सूर्यम्। परि। अपश्यत्। गायत्रस्य। सम्ऽइधः। तिस्रः। आहुः। ततः। मह्रा। प्र। रिरिचे। महिऽत्वा ॥ १.१६४.२५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो जगदीश्वर (जगता) संसार के साथ (सिन्धुम्) नदी आदि को (दिवि) प्रकाश (रथन्तरे) और अन्तरिक्ष में (सूर्यम्) सवितृलोक को (अस्तभायत्) रोकता व सबको (पर्य्यपश्यत्) सब ओर से देखता है वा जिन (गायत्रस्य) गायत्री छन्द से अच्छे प्रकार से साधे हुए ऋग्वेद की उत्तेजना से (तिस्रः, समिधः) अच्छे प्रकार प्रज्वलित तीन पदार्थों को अर्थात् भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान तीनों काल के सुखों को (आहुः) कहते हैं (ततः) उनसे (मह्ना) बड़े (महित्वा) प्रशंसनीय भाव से (प्र, रिरिचे) अलग होता है अर्थात् अलग गिना जाता है वह सबको पूजने योग्य है ॥ २५ ॥
Essence
जब ईश्वर ने जगत् बनाया तभी नदी और समुद्र आदि बनाये। जैसे सूर्य आकर्षण से भूगोलों को धारण करता है, वैसे सूर्य आदि जगत् को ईश्वर धारण करता है। जो सब जीवों के समस्त पाप पुण्यरूपी कर्म्मों को जानके फलों को देता है, वह ईश्वर सब पदार्थों से बड़ा है ॥ २५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।