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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 22

191 Sukta
52 Mantra
1/164/22
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यस्मि॑न्वृ॒क्षे म॒ध्वद॑: सुप॒र्णा नि॑वि॒शन्ते॒ सुव॑ते॒ चाधि॒ विश्वे॑। तस्येदा॑हु॒: पिप्प॑लं स्वा॒द्वग्रे॒ तन्नोन्न॑श॒द्यः पि॒तरं॒ न वेद॑ ॥

यस्मि॑न् । वृ॒क्षे । म॒धु॒ऽअदः॑ । सु॒ऽप॒र्णाः । नि॒ऽवि॒शन्ते॑ । सुव॑ते । च॒ । अधि॑ । विश्वे॑ । तस्य॑ । इत् । आ॒हुः॒ । पिप्प॑लम् । स्वा॒दु । अग्रे॑ । तत् । न । उत् । न॒श॒त् । यः । पि॒तर॑म् । न । वेद॑ ॥

Mantra without Swara
यस्मिन्वृक्षे मध्वद: सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे। तस्येदाहु: पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद ॥

यस्मिन्। वृक्षे। मधुऽअदः। सुऽपर्णाः। निऽविशन्ते। सुवते। च। अधि। विश्वे। तस्य। इत्। आहुः। पिप्पलम्। स्वादु। अग्रे। तत्। न। उत्। नशत्। यः। पितरम्। न। वेद ॥ १.१६४.२२

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वानो ! (यस्मिन्) जिस (विश्वे) समस्त (वृक्षे) वृक्ष पर (मध्वदः) मधु को खानेवाले (सुपर्णाः) सुन्दर पंखों से युक्त भौंरा आदि पक्षी (नि विशन्ते) स्थिर होते हैं (अधि, सुवते, च) और आधारभूत होकर अपने बालकों को उत्पन्न करते (तस्य, इत्) उसीके (पिप्पलम्) जल के समान निर्मल फल को (अग्रे) आगे (स्वादु) स्वादिष्ठ (आहुः) कहते हैं और (तत्) वह (न)(उत् नशत्) नष्ट होता है अर्थात् वृक्षरूप इस जगत् में मधुर कर्मफलों को खानेवाले उत्तम कर्मयुक्त जीव स्थिर होते और उसमें सन्तानों को उत्पन्न करते हैं उसका जल के समान निर्मल कर्मफल संसार में होना इसको आगे उत्तम कहते हैं। और नष्ट नहीं होता अर्थात् पीछे अशुभ कर्मों के करने से संसाररूप वृक्ष का जो फल चाहिये सो नहीं मिलता (यः) जो पुरुष (पितरम्) पालनेवाले परमात्मा को (न, वेद) नहीं जानता वह इस संसार के उत्तम फल को नहीं पाता ॥ २२ ॥
Essence
इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। अनादि अनन्त काल से यह विश्व उत्पन्न होता और नष्ट होता है, जीव उत्पन्न होते और मरते भी जाते हैं, इस संसार में जीवों ने जैसा कर्म किया वैसा ही अवश्य ईश्वर के न्याय से भोग्य है। कर्म, जीव का भी नित्यसम्बन्ध है। जो परमात्मा और उसके गुण, कर्म, स्वभावों के अनुकूल आचरण को न जानकर मनमाने काम करते हैं, वे निरन्तर पीड़ित होते हैं और जो उससे विपरीत हैं, वे सदा आनन्द भोगते हैं ॥ २२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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