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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 20

191 Sukta
52 Mantra
1/164/20
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑ षस्वजाते। तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भि चा॑कशीति ॥

द्वा । सु॒ऽप॒र्णा । स॒ऽयुजा॑ । सखा॑या । स॒म॒नम् । वृ॒क्षम् । परि॑ । स॒स्व॒जा॒ते॒ इति॑ । तयोः॑ । अ॒न्यः । पिप्प॑लम् । स्वा॒दु । अत्ति॑ । अन॑श्नन् । अ॒न्यः । अ॒भि । चा॒क॒शी॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति ॥

द्वा। सुऽपर्णा। सऽयुजा। सखाया। समानम्। वृक्षम्। परि। सस्वजाते इति। तयोः। अन्यः। पिप्पलम्। स्वादु। अत्ति। अनश्नन्। अन्यः। अभि। चाकशीति ॥ १.१६४.२०

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (सुपर्णा) सुन्दर पंखोंवाले (सयुजा) समान सम्बन्ध रखनेवाले (सखाया) मित्रों के समान वर्त्तमान (द्वा) दो पखेरू (समानम्) एक (वृक्षम्) जो काटा जाता उस वृक्ष का (परि, सस्वजाते) आश्रय करते हैं (तयोः) उनमें से (अन्यः) एक (पिप्पलम्) उस वृक्ष के पके हुए फल को (स्वादु) स्वादुपन से (अत्ति) खाता है और (अन्यः) दूसरा (अनश्नत्) न खाता हुआ (अभि, चाकशीति) सब ओर से देखता है अर्थात् सुन्दर चलने-फिरने वा क्रियाजन्य काम को जाननेवाले व्याप्यव्यापकभाव से साथ ही सम्बन्ध रखते हुए मित्रों के समान वर्त्तमान जीव और ईश-परमात्मा समान कार्यकारणरूप ब्रह्माण्ड देह का आश्रय करते हैं। उन दोनों अनादि जीव ब्रह्म में जो जीव है वह पाप-पुण्य से उत्पन्न सुख-दुःखात्मक भोग को स्वादुपन से भोगता है और दूसरा ब्रह्मात्मा कर्मफल को न भोगता हुआ उस भोगते हुए जीव को सब ओर से देखता अर्थात् साक्षी है यह तुम जानो ॥ २० ॥
Essence
इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। जीव, परमात्मा और जगत् का कारण ये तीन पदार्थ अनादि और नित्य हैं। जीव और ईश-परमात्मा यथाक्रम से अल्प अनन्त चेतन विज्ञानवान् सदा विलक्षण व्याप्यव्यापकभाव से संयुक्त और मित्र के समान वर्त्तमान हैं। वैसे ही जिस अव्यक्त परमाणुरूप कारण से कार्य्यरूप जगत् होता है वह भी अनादि और नित्य है। समस्त जीव पाप-पुण्यात्मक कार्यों को करके उनके फलों को भोगते हैं और ईश्वर एक सब ओर से व्याप्त होता हुआ न्याय से पाप-पुण्य के फल को देने से न्यायाधीश के समान देखता है ॥ २० ॥
Subject
अब ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।