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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 19

191 Sukta
52 Mantra
1/164/19
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये अ॒र्वाञ्च॒स्ताँ उ॒ परा॑च आहु॒र्ये परा॑ञ्च॒स्ताँ उ॑ अ॒र्वाच॑ आहुः। इन्द्र॑श्च॒ या च॒क्रथु॑: सोम॒ तानि॑ धु॒रा न यु॒क्ता रज॑सो वहन्ति ॥

ये । अ॒र्वाञ्चः॑ । तान् । ऊँ॒ इति॑ । परा॑चः । आ॒हुः॒ । ये । परा॑ञ्चः । तान् । ऊँ॒ इति॑ । अ॒र्वाचः॑ । आ॒हुः॒ । इन्द्रः॑ । च॒ । या । च॒क्रथुः॑ । सो॒म॒ । तानि॑ । धु॒रा । न । यु॒क्ताः । रज॑सः । व॒ह॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
ये अर्वाञ्चस्ताँ उ पराच आहुर्ये पराञ्चस्ताँ उ अर्वाच आहुः। इन्द्रश्च या चक्रथु: सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति ॥

ये। अर्वाञ्चः। तान्। ऊँ इति। पराचः। आहुः। ये। पराञ्चः। तान्। ऊँ इति। अर्वाचः। आहुः। इन्द्रः। च। या। चक्रथुः। सोम। तानि। धुरा। न। युक्ताः। रजसः। वहन्ति ॥ १.१६४.१९

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) ऐश्वर्ययुक्त विद्वान् ! (ये) जो (अर्वाञ्चः) नीचे जानेवाले पदार्थ हैं (तान्, उ) उन्हीं को (पराचः) परे को पहुँचे हुए (आहुः) कहते हैं। और (ये) जो (पराञ्चः) परे से व्यवहार में लाये जाते अर्थात् परभाग में पहुँचनेवाले हैं (तान्, उ) उन्हें तर्क-वितर्क से (अर्वाचः) नीचे जानेवाले (आहुः) कहते हैं उनको जानो, (इन्द्रः) सूर्य (च) और वायु (या) जिन भुवनों को धारण करते हैं (तानि) उनको (युक्ताः) युक्त हुए अर्थात् उन में सम्बन्ध किये हुए पदार्थ (धुरा) धारण करनेवाली धुरी में जुड़े हुए घोड़ों के (न) समान (रजसः) लोकों को (वहन्ति) बहाते चलाते हैं उनको हे पढ़ाने और उपदेश करनेवालो ! तुम विदित (चक्रथुः) करो जानो ॥ १९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! यहाँ नीचे, ऊपर, परे, उरे, मोटे, सूक्ष्म, छुटाई-बड़ाई के व्यवहार हैं वे सापेक्ष हैं। एक की अपेक्षा से यह इससे ऊँचा जो कहा जाता है, वही दोनों कथनों को प्राप्त होता है। जो इससे परे है वही और से नीचे है, जो इससे मोटा है वह और से सूक्ष्म। जो-जो इससे छोटा है वह और से बड़ा गुरु है यह तुम जानो, यहाँ कोई वस्तु अपेक्षारहित नहीं है और न निराधार ही है ॥ १९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।