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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 18

191 Sukta
52 Mantra
1/164/18
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒वः परे॑ण पि॒तरं॒ यो अ॑स्यानु॒वेद॑ प॒र ए॒नाव॑रेण। क॒वी॒यमा॑न॒: क इ॒ह प्र वो॑चद्दे॒वं मन॒: कुतो॒ अधि॒ प्रजा॑तम् ॥

अ॒वः । परे॑ण । पि॒तर॑म् । यः । अ॒स्य॒ । अ॒नु॒ऽवेद॑ । प॒रः । ए॒ना । अव॑रेण । क॒वि॒ऽयमा॑नः । कः । इ॒ह । प्र । वो॒च॒त् । दे॒वम् । मनः॑ । कुतः॑ । अधि॑ । प्रऽजा॑तम् ॥

Mantra without Swara
अवः परेण पितरं यो अस्यानुवेद पर एनावरेण। कवीयमान: क इह प्र वोचद्देवं मन: कुतो अधि प्रजातम् ॥

अवः। परेण। पितरम्। यः। अस्य। अनुऽवेद। परः। एना। अवरेण। कविऽयमानः। कः। इह। प्र। वोचत्। देवम्। मनः। कुतः। अधि। प्रऽजातम् ॥ १.१६४.१८

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 3

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Meaning
जो विद्वान् (अस्य) इसके (अवः) अधोभाग से और (परेण) परभाग से वर्त्तमान (पितरम्) पालनेवाले सूर्य को (अनुवेद) विद्या पढ़ने के अनन्तर जानता है (यः) जो (परः) पर और (एना) इस उक्त (अवरेण) नीचे के मार्ग से जानता है वह (कवीयमानः) अतीव विद्वान् है और (कुतः) कहाँ से यह (देवम्) दिव्यगुणसम्पन्न (मनः) अन्तःकरण (प्रजातम्) उत्पन्न हुआ ऐसा (इह) इस विद्या वा जगत् में (कः) कौन (अधि, प्र, वोचत्) अधिकतर कहे ॥ १८ ॥
Essence
जो मनुष्य बिजुली को लेकर सूर्यपर्यन्त अग्नि को पिता के समान पालनेवाला जानें जिसके पराऽवर भाग में कार्यकारण स्वरूप हैं उसका उपदेश दिव्य अन्तःकरणवाले होकर इस संसार में कहें ॥ १८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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