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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 17

191 Sukta
52 Mantra
1/164/17
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒वः परे॑ण प॒र ए॒नाव॑रेण प॒दा व॒त्सं बिभ्र॑ती॒ गौरुद॑स्थात्। सा क॒द्रीची॒ कं स्वि॒दर्धं॒ परा॑गा॒त्क्व॑ स्वित्सूते न॒हि यू॒थे अ॒न्तः ॥

अ॒वः । परे॑ण । प॒रः । ए॒ना । अव॑रेण । प॒दा । व॒त्सम् । बिभ्र॑ती । गौः । उत् । अ॒स्था॒त् । सा । क॒द्रीची॑ । कम् । स्वि॒त् । अर्ध॑म् । परा॑ । अ॒गा॒त् । क्व॑ । स्वि॒त् । सू॒ते॒ । न॒हि । यू॒थे । अ॒न्तरिति॑ ॥

Mantra without Swara
अवः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्। सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात्क्व स्वित्सूते नहि यूथे अन्तः ॥

अवः। परेण। परः। एना। अवरेण। पदा। वत्सम्। बिभ्रती। गौः। उत्। अस्थात्। सा। कद्रीची। कम्। स्वित्। अर्धम्। परा। अगात्। क्व। स्वित्। सूते। नहि। यूथे। अन्तरिति ॥ १.१६४.१७

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (वत्सम्) उत्पन्न हुए मनुष्यादि संसार को (बिभ्रती) धारण करती हुई (गौः) गमन करनेवाली जिस (परेण) परले वा (अवरेण) उरले (पदा) प्राप्त करनेवाले गमनरूप चरण से (अवः) नीचे से (उदस्थात्) उठती है (एना) इससे (परः) पीछे से उठती है जो (यूथे) समूह के (अन्तः) बीच में (कम्, स्वित्) किसीको (अर्द्धम्) आधा (सूते) उत्पन्न करती है (सा) वह (कद्रीची) अप्रत्यक्ष गमन करनेवाली (क्व, स्वित्) किसी में (नहि) नहीं (परा, आगात्) पर को लौट जाती ॥ १७ ॥
Essence
यह पृथिवी सूर्य से नीचे ऊपर और उत्तर दक्षिण को जाती है। इसकी गति विद्वानों के विना न देखी जाती। इसके परले आधे भाग में सदा अन्धकार और उरले आधे भाग में प्रकाश वर्त्तमान है बीच में सब पदार्थ वर्त्तमान हैं, सो यह पृथिवी माता के तुल्य सबकी रक्षा करती है ॥ १७ ॥
Subject
फिर पृथिव्यादिकों के कार्यकारण विषय को कहा है ।