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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 15

191 Sukta
52 Mantra
1/164/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सा॒कं॒जानां॑ स॒प्तथ॑माहुरेक॒जं षळिद्य॒मा ऋष॑यो देव॒जा इति॑। तेषा॑मि॒ष्टानि॒ विहि॑तानि धाम॒शः स्था॒त्रे रे॑जन्ते॒ विकृ॑तानि रूप॒शः ॥

सा॒क॒म्ऽजाना॑म् । स॒प्तथ॑म् । आ॒हुः॒ । ए॒क॒ऽजम् । षट् । इत् । य॒माः । ऋष॑यः । दे॒व॒ऽजाः । इति॑ । तेषा॑म् । इ॒ष्टानि॑ । विऽहि॑तानि । धा॒म॒ऽशः स्था॒त्रे । रे॒ज॒न्ते॒ । विऽकृ॑तानि । रू॒प॒ऽशः ॥

Mantra without Swara
साकंजानां सप्तथमाहुरेकजं षळिद्यमा ऋषयो देवजा इति। तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः ॥

साकम्ऽजानाम्। सप्तथम्। आहुः। एकऽजम्। षट्। इत्। यमाः। ऋषयः। देवऽजाः। इति। तेषाम्। इष्टानि। विऽहितानि। धामऽशः। स्थात्रे। रेजन्ते। विऽकृतानि। रूपऽशः ॥ १.१६४.१५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! तुम (साकंजानाम्) एक साथ उत्पन्न हुए पदार्थों के बीच में जिस (एकजम्) एक कारण से उत्पन्न महत्तत्त्व को (सप्तथम्) सातवाँ (आहुः) कहते हैं, जहाँ (षट्) छः (देवजाः) देदीप्यमान बिजुली से उत्पन्न हुए (यमाः) नियन्ता अर्थात् सबको यथायोग्य व्यवहारों में वर्त्तानेवाले (ऋषयः) आप सब में मिलनेवाले ऋतु वर्त्तमान हैं (तेषाम्) उनके बीच जिन (धामशः) प्रत्येक स्थान में (इष्टानि) मिले हुए पदार्थों को ईश्वर ने (विहितानि) रचा है और जो (रूपशः) रूपों के साथ (विकृतानि) अवस्थान्तर को प्राप्त हुए (स्थात्रे) स्थित कारण के बीच (रेजन्ते) चलायमान होते उन सबको (इत्) ही (इति) इस प्रकार से जानो ॥ १५ ॥
Essence
जो इस जगत् में पदार्थ हैं वे सब ब्रह्म के निश्चित किये हुए व्यवहार से एक साथ उत्पन्न होते हैं। यहाँ रचना में क्रम की आकाङ्क्षा नहीं है क्योंकि परमेश्वर के सर्वव्यापक और अनन्त सामर्थ्यवाला होने से। इससे वह आप अचलित हुआ सब भुवनों को चलाता है और वह ईश्वर विकाररहित होता हुआ सबको विकारयुक्त करता है। जैसे क्रम से ऋतु वर्त्तमान हैं और अपने अपने चिह्नों को समय समय में उत्पन्न करते हैं, वैसे ही उत्पन्न होते हुए पदार्थ अपने-अपने गुणों को प्राप्त होते हैं ॥ १५ ॥
Subject
अब पृथिव्यादिकों की रचना विशेष की व्याख्या करते हैं ।