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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 14

191 Sukta
52 Mantra
1/164/14
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सने॑मि च॒क्रम॒जरं॒ वि वा॑वृत उत्ता॒नायां॒ दश॑ यु॒क्ता व॑हन्ति। सूर्य॑स्य॒ चक्षू॒ रज॑सै॒त्यावृ॑तं॒ तस्मि॒न्नार्पि॑ता॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

सऽने॑मि । च॒क्रम् । अ॒जर॑म् । वि । व॒वृ॒ते॒ । उ॒त्ता॒नाया॑म् । दश॑ । यु॒क्ताः । व॒ह॒न्ति॒ । सूर्य॑स्य । चक्षिः॑ । रज॑सा । ए॒ति॒ । आऽवृ॑तम् । तस्मि॑न् । आर्पि॑ता । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
सनेमि चक्रमजरं वि वावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति। सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं तस्मिन्नार्पिता भुवनानि विश्वा ॥

सऽनेमि। चक्रम्। अजरम्। वि। ववृते। उत्तानायाम्। दश। युक्ताः। वहन्ति। सूर्यस्य। चक्षुः। रजसा। एति। आऽवृतम्। तस्मिन्। आर्पिता। भुवनानि। विश्वा ॥ १.१६४.१४

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सनेमि) समान नेमि नाभिवाला (अजरम्) जरा दोष से रहित (चक्रम्) चक्र के समान वर्त्तमान कालचक्र (उत्तानायाम्) उत्तम विथरे हुए जगत् में (वि, ववृते) विशेष कर बार-बार आता है और उस कालचक्र को (दश) दश प्राण (युक्ताः) युक्त (वहन्ति) बहाते हैं। जो (सूर्यस्य) सूर्य का (चक्षुः) व्यक्ति प्रकटता करनेवाला भाग (रजसा) लोकों के साथ (आवृतम्) सब ओर से आवरण को (एति) प्राप्त होता है अर्थात् ढंप जाता है (तस्मिन्) उसमें (विश्वा) समस्त (भुवनानि) भूगोल (आर्पिता) स्थापित हैं ऐसा तुम जानो ॥ १४ ॥
Essence
जो विभु, नित्य और सब लोकों का आधार समय वर्त्तमान है, उसी काल की गति से सूर्य आदि लोक प्रकाशित होते हैं, ऐसा सब लोगों को जानना चाहिये ॥ १४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।