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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 13

191 Sukta
52 Mantra
1/164/13
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पञ्चा॑रे च॒क्रे प॑रि॒वर्त॑माने॒ तस्मि॒न्ना त॑स्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तस्य॒ नाक्ष॑स्तप्यते॒ भूरि॑भारः स॒नादे॒व न शी॑र्यते॒ सना॑भिः ॥

पञ्च॑ऽअरे । च॒क्रे । प॒रि॒ऽवर्त॑माने । तस्मि॑न् । आ । त॒स्थुः॒ । भुव॑नानि । विश्वा॑ । तस्य॑ । न । अक्षः॑ । त॒प्य॒ते॒ । भूरि॑ऽभारः । स॒नात् । ए॒व । न । शी॒र्य॒ते॒ । सऽना॑भिः ॥

Mantra without Swara
पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्ना तस्थुर्भुवनानि विश्वा। तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः ॥

पञ्चऽअरे। चक्रे। परिऽवर्तमाने। तस्मिन्। आ। तस्थुः। भुवनानि। विश्वा। तस्य। न। अक्षः। तप्यते। भूरिऽभारः। सनात्। एव। न। शीर्यते। सऽनाभिः ॥ १.१६४.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (पञ्चारे) जिसमें पाँच तत्त्व अरारूप हैं (परिवर्त्तमाने) और जो सब ओर से वर्त्तमान (तस्मिन्) उस (चक्रे) पहिये के समान ढुलकते हुए पञ्चतत्त्व के पञ्चीकरण में (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक (आ, तस्थुः) अच्छे प्रकार स्थिर होते हैं (तस्य) उसका (अक्षः) अगला भाग अर्थात् जो उससे प्रथम ईश्वर है वह (न) नहीं (तप्यते) कष्ट को प्राप्त होता अर्थात् संसार के सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता (सनाभिः) और जिसका समान बन्धन है अर्थात् क्रिया के साथ में लगा हुआ है और (भूरिभारः) जिनमें बहुत भार हैं बहुत कार्य कारण आरोपित हैं वह काल (सनात्) सनातनपन से (नैव) नहीं (शीर्यते) नष्ट होता ॥ १३ ॥
Essence
जैसे यह चक्ररूप कारण, काल, आकाश और दिशात्मक जगत् परमेश्वर में व्याप्त है, वैसे ही काल, आकाश और दिशाओं में कार्यकारणात्मक जगत् व्याप्य है ॥ १३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।