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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 12

191 Sukta
52 Mantra
1/164/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पञ्च॑पादं पि॒तरं॒ द्वाद॑शाकृतिं दि॒व आ॑हु॒: परे॒ अर्धे॑ पुरी॒षिण॑म्। अथे॒मे अ॒न्य उप॑रे विचक्ष॒णं स॒प्तच॑क्रे॒ षळ॑र आहु॒रर्पि॑तम् ॥

पञ्च॑ऽपादम् । पि॒तर॑म् । द्वाद॑शऽआकृतिम् । दि॒वः । आ॒हुः॒ । परे॑ । अर्धे॑ । पु॒री॒षिण॑म् । अथ॑ । इ॒मे । अ॒न्ये । उप॑रे । वि॒ऽच॒क्ष॒णम् । स॒प्तऽच॑क्रे । षट्ऽअ॑रे । आ॒हुः॒ । अर्पि॑तम् ॥

Mantra without Swara
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहु: परे अर्धे पुरीषिणम्। अथेमे अन्य उपरे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितम् ॥

पञ्चऽपादम्। पितरम्। द्वादशऽआकृतिम्। दिवः। आहुः। परे। अर्धे। पुरीषिणम्। अथ। इमे। अन्ये। उपरे। विऽचक्षणम्। सप्तऽचक्रे। षट्ऽअरे। आहुः। अर्पितम् ॥ १.१६४.१२

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (पञ्चपादम्) क्षण, मुहूर्त्त, प्रहर, दिवस, पक्ष, ये पाँच पग जिसके (पितरम्) पिता के तुल्य पालना करानेवाले (द्वादशाकृतिम्) बारह महीने जिसका आकार (पुरीषिणम्) और मिले हुए पदार्थों की प्राप्ति वा हिंसा करानेवाले अर्थात् उनकी मिलावट को अलग अलग करानेहारे संवत्सर को (दिवः) प्रकाशमान सूर्य के (परे) परले (अर्द्धे) आधे भाग में विद्वान् (आहुः) कहते हैं बताते हैं (अथ) इसके अनन्तर (इमे) ये (अन्ये) और विद्वान् जन (षडरे) जिसमें छः ऋतु आरारूप और (सप्तचक्रे) सात चक्र घूमने की परिधि विद्यमान उस (उपरे) मेघमण्डल में (विचक्षणम्) वाणी के विषय को (अर्पितम्) स्थापित (आहुः) कहते हैं, उसको जानो ॥ १२ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम इस मन्त्र में काल के अवयव कहने को अभीष्ट हैं जिस विभु एक रस सनातन काल में समस्त जगत् उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयान्त लब्ध होता है, उसके सूक्ष्मत्व से उस काल का बोध कठिन है, इससे प्रयत्न से जानो ॥ १२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।