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Rigveda Mandal 1 / Sukta 164 / Mantra 11

191 Sukta
52 Mantra
1/164/11
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द्वाद॑शारं न॒हि तज्जरा॑य॒ वर्व॑र्ति च॒क्रं परि॒ द्यामृ॒तस्य॑। आ पु॒त्रा अ॑ग्ने मिथु॒नासो॒ अत्र॑ स॒प्त श॒तानि॑ विंश॒तिश्च॑ तस्थुः ॥

द्वाद॑शऽअरम् । न॒हि । तत् । जरा॑य । वर्व॑र्ति । च॒क्रम् । परि॑ । द्याम् । ऋ॒तस्य॑ । आ । पु॒त्राः । अ॒ग्ने॒ । मि॒थु॒नासः॑ । अत्र॑ । स॒प्त । श॒तानि॑ । विं॒श॒तिः । च॒ । त॒स्थुः॒ ॥

Mantra without Swara
द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य। आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थुः ॥

द्वादशऽअरम्। नहि। तत्। जराय। वर्वर्ति। चक्रम्। परि। द्याम्। ऋतस्य। आ। पुत्राः। अग्ने। मिथुनासः। अत्र। सप्त। शतानि। विंशतिः। च। तस्थुः ॥ १.१६४.११

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! तू (अत्र) इस संसार में जो (द्वादशारम्) जिसके बारह अङ्ग हैं वह (चक्रम्) चक्र के समान वर्त्तमान संवत्सर (द्याम्) प्रकाशमान सूर्य के (परि, वर्वर्त्ति) सब ओर से निरन्तर वर्त्तमान है (तत्) वह (जराय) हानि के लिये (नहि) नहीं होता है जो इस संसार में (ऋतस्य) सत्य कारण से (सप्त) सात (शतानि) सौ (विंशतिः) बीस (च) भी (मिथुनासः) संयोग से उत्पन्न हुए (पुत्राः) पुत्रों के समान वर्त्तमान तत्त्व विषय (आ, तस्थुः) अपने अपने विषयों में लगे हैं, उनको जान ॥ ११ ॥
Essence
काल अनन्त अपरिणामी और विभु वर्त्तमान है, न उसकी कभी उत्पत्ति है और न नाश है। इस जगत् के कारण में सात सौ बीस जो तत्त्व हैं, वे मिलके स्थूल, ईश्वर के निर्माण किए हुए योग से उत्पन्न हुए हैं, इनका कारण अज और नित्य है, जबतक अलग अलग इन तत्त्वों को प्रत्यक्ष में न जाने तबतक विद्या की वृद्धि के लिये मनुष्य यत्न किया करे ॥ ११ ॥
Subject
अब विशेष कर काल की व्यवस्था को कहते हैं ।