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Rigveda Mandal 1 / Sukta 163 / Mantra 6

191 Sukta
13 Mantra
1/163/6
Devata- अश्वोऽग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒त्मानं॑ ते॒ मन॑सा॒राद॑जानाम॒वो दि॒वा प॒तय॑न्तं पतं॒गम्। शिरो॑ अपश्यं प॒थिभि॑: सु॒गेभि॑ररे॒णुभि॒र्जेह॑मानं पत॒त्रि ॥

आ॒त्मान॑म् । ते॒ । मन॑सा । आ॒रात् । अ॒जा॒ना॒म् । अ॒वः । दि॒वा । प॒तय॑न्तम् । प॒त॒ङ्गम् । शिरः॑ । अ॒प॒श्य॒म् । प॒थिऽभिः॑ । सु॒ऽगेभिः॑ । अ॒रे॒णुऽभिः॑ । जेह॑मानम् । प॒त॒त्रि ॥

Mantra without Swara
आत्मानं ते मनसारादजानामवो दिवा पतयन्तं पतंगम्। शिरो अपश्यं पथिभि: सुगेभिररेणुभिर्जेहमानं पतत्रि ॥

आत्मानम्। ते। मनसा। आरात्। अजानाम्। अवः। दिवा। पतयन्तम्। पतङ्गम्। शिरः। अपश्यम्। पथिऽभिः। सुऽगेभिः। अरेणुऽभिः। जेहमानम्। पतत्रि ॥ १.१६३.६

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जैसे मैं (ते) तेरे (आत्मानम्) सबके अधिष्ठाता आत्मा को (मनसा) विज्ञान से (आरात्) दूर से वा निकट से (अपश्यम्) देखूँ वैसे तूँ मेरे आत्मा को देख, जैसे मैं तेरे (अवः) पालने को वा (पतत्रि) गिरने के स्वभाव को और (शिरः) जो सेवन किया जाता उस शिर को देखूँ वैसे तूँ मेरे उक्त पदार्थ को देख, जैसे (अरेणुभिः) धूलि से रहित (सुगेभिः) सुख से जिनमें जाते उन (पथिभिः) मार्गों से (जेहमानम्) उत्तम यत्न करते (दिवा) अन्तरिक्ष में (पतयन्तम्) जाते हुए (पतङ्गम्) प्रत्येक स्थान में पहुँचनेवाले अग्निरूप घोड़े को (अजानाम्) देखूँ वैसे तूँ भी देख ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपने वा पराये आत्मा के जाननेवाले विज्ञान से उत्पन्न कार्यों की परीक्षा द्वारा कारण गुणों को जानते हैं वे सुख से विद्वान् होते हैं। जो विन ढपे, विन, धूल के संयोग अन्तरिक्ष में अग्नि आदि पदार्थों के योग से विमानादिकों को चलाते हैं, वे दूर देश को भी शीघ्र जाने को योग्य होते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।