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Rigveda Mandal 1 / Sukta 163 / Mantra 4

191 Sukta
13 Mantra
1/163/4
Devata- अश्वोऽग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्रीणि॑ त आहुर्दि॒वि बन्ध॑नानि॒ त्रीण्य॒प्सु त्रीण्य॒न्तः स॑मु॒द्रे। उ॒तेव॑ मे॒ वरु॑णश्छन्त्स्यर्व॒न्यत्रा॑ त आ॒हुः प॑र॒मं ज॒नित्र॑म् ॥

त्रीणि॑ । ते॒ । आ॒हुः॒ । दि॒वि । बन्ध॑नानि । त्रीणि॑ । अ॒प्ऽसु । त्रीणि॑ । अ॒न्तरिति॑ । स॒मु॒द्रे । उ॒तऽइ॑व । मे॒ । वरु॑णः । छ॒न्त्सि॒ । अ॒र्व॒न् । यत्र॑ । ते॒ । आ॒हुः । प॒र॒मम् । ज॒नित्र॑म् ॥

Mantra without Swara
त्रीणि त आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे। उतेव मे वरुणश्छन्त्स्यर्वन्यत्रा त आहुः परमं जनित्रम् ॥

त्रीणि। ते। आहुः। दिवि। बन्धनानि। त्रीणि। अप्ऽसु। त्रीणि। अन्तरिति। समुद्रे। उतऽइव। मे। वरुणः। छन्त्सि। अर्वन्। यत्र। ते। आहुः। परमम्। जनित्रम् ॥ १.१६३.४

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 4

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Meaning
हे (अर्वन्) विशेष ज्ञानवाले सज्जन ! (यत्र) जहाँ (ते) तेरा (परमम्) उत्तम (जनित्रम्) जन्म (आहुः) कहते हैं वहाँ मेरा भी उत्तम जन्म है, (वरुणः) श्रेष्ठ तूँ जैसे (छन्त्सि) बलवान् होता है वैसे मैं बलवान् होता हूँ, जैसे (ते) तेरे (त्रीणि) तीन (अन्तः) भीतर (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (त्रीणि) तीन (अप्सु) जलों में (त्रीणि) तीन (दिवि) प्रकाशमान अग्नि में भी (बन्धनानि) बन्धन (आहुः) अगले जनों ने कहे हैं (उतेव) उसीके समान (मे) मेरे भी हैं ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि के कारण, सूक्ष्म और स्थूल रूप हैं, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी के भी हैं, वैसे सब उत्पन्न हुए पदार्थों के तीन स्वरूप हैं। हे विद्वान् ! जैसे तुम्हारा विद्या जन्म उत्तम है, वैसा मेरा भी हो ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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