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Rigveda Mandal 1 / Sukta 163 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/163/11
Devata- अश्वोऽग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तव॒ शरी॑रं पतयि॒ष्ण्व॑र्व॒न्तव॑ चि॒त्तं वात॑ इव॒ ध्रजी॑मान्। तव॒ शृङ्गा॑णि॒ विष्ठि॑ता पुरु॒त्रार॑ण्येषु॒ जर्भु॑राणा चरन्ति ॥

तव॑ । शरी॑रम् । प॒त॒यि॒ष्णु । अ॒र्व॒न् । तव॑ । चि॒त्तम् । वातः॑ऽइव । ध्रजी॑मान् । तव॑ । शृङ्गा॑णि । विऽष्ठि॑ता । पुरु॒ऽत्रा । अर॑ण्येषु । जर्भु॑राणा । च॒र॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
तव शरीरं पतयिष्ण्वर्वन्तव चित्तं वात इव ध्रजीमान्। तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति ॥

तव। शरीरम्। पतयिष्णु। अर्वन्। तव। चित्तम्। वातःऽइव। ध्रजीमान्। तव। शृङ्गाणि। विऽष्ठिता। पुरुऽत्रा। अरण्येषु। जर्भुराणा। चरन्ति ॥ १.१६३.११

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 1

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Meaning
हे (अर्वन्) गमनशील घोड़े के समान वर्त्ताव रखनेवाले ! जैसे (पतयिष्णु) गमनशील विमान आदि यान वा (तव) तेरा (शरीरम्) शरीर वा (ध्रजीमान्) गतिवाला (वातइव) पवन के समान तव तेरा (चित्तम्) चित्त वा (पुरुत्रा) बहुत (अरण्येषु) वनों में (विष्ठिता) विशेषता से ठहरे हुए (जर्भुराणा) अत्यन्त पुष्ट (शृङ्गाणि) सींगों के तुल्य ऊँचे वा उत्कृष्ट अत्युत्तम काम अग्नि से (चरन्ति) चलते हैं वैसे (तव) तेरे इन्द्रिय और प्राण वर्त्तमान हैं ॥ ११ ॥
Essence
जिन्होंने चलाई हुई बिजुली मन के समान जाती वा पर्वतों के शिखरों के समान विमान आदि यान रचे हैं और जो वन की आग के समान अग्नि के घरों में अग्नि जलाकर विमान आदि रथों को चलाते हैं, वे सर्वत्र भूगोल में विचरते हैं ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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