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Rigveda Mandal 1 / Sukta 163 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/163/10
Devata- अश्वोऽग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ई॒र्मान्ता॑स॒: सिलि॑कमध्यमास॒: सं शूर॑णासो दि॒व्यासो॒ अत्या॑:। हं॒सा इ॑व श्रेणि॒शो य॑तन्ते॒ यदाक्षि॑षुर्दि॒व्यमज्म॒मश्वा॑: ॥

ई॒र्मऽअ॑न्तासः । सिलि॑कऽमध्यमासः । सम् । शूर॑णासः । दि॒व्यासः । अत्याः॑ । हं॒साःऽइ॑व । श्रे॒णि॒ऽशः । य॒त॒न्ते॒ । यत् । आक्षि॑षुः । दि॒व्यम् । अज्म॑म् । अश्वाः॑ ॥

Mantra without Swara
ईर्मान्तास: सिलिकमध्यमास: सं शूरणासो दिव्यासो अत्या:। हंसा इव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वा: ॥

ईर्मऽअन्तासः। सिलिकऽमध्यमासः। सम्। शूरणासः। दिव्यासः। अत्याः। हंसाःऽइव। श्रेणिऽशः। यतन्ते। यत्। आक्षिषुः। दिव्यम्। अज्मम्। अश्वाः ॥ १.१६३.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वानो ! (तत्) जो (सिलिकमध्यमासः) स्थान में प्रसिद्ध हुए (ईर्मान्तासः) कम्पन जिनका अन्त (शूरणासः) हिंसक अर्थात् कलायन्त्र को प्रबलता से ताड़ना देते हुए प्रकाशमान (दिव्यासः) दिव्यगुण, कर्म, स्वभाववाले (अत्याः) निरन्तर जानेवाले (अश्वाः) शीघ्र जानेवाले अग्न्यादि रूप घोड़े (हंसाइव) हंसों के समान (श्रेणिशः) पङ्क्ति सी किये हुए वर्त्तमान (सं, यतन्ते) अच्छा प्रयत्न कराते हैं और (दिव्यम्) अन्तरिक्ष में हुए (अज्मम्) मार्ग को (आक्षिषुः) व्याप्त होते हैं उन वायु, अग्नि और जलादिकों को कार्य्यों में अच्छे प्रकार लगाओ ॥ १० ॥
Essence
जो सिलिकादि यन्त्रों से अर्थात् जिनमें कोठे-दरकोठे कलाओं के होते हैं, उन यन्त्रों से बिजुली आदि उत्पन्न कर और विमान आदि यानों में उनका संप्रयोग कर कार्यसिद्धि को करते हैं, वे मनुष्य बड़ी भारी लक्ष्मी को पाते हैं ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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