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Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 6

191 Sukta
22 Mantra
1/162/6
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यू॒प॒व्र॒स्का उ॒त ये यू॑पवा॒हाश्च॒षालं॒ ये अ॑श्वयू॒पाय॒ तक्ष॑ति। ये चार्व॑ते॒ पच॑नं स॒म्भर॑न्त्यु॒तो तेषा॑म॒भिगू॑र्तिर्न इन्वतु ॥

यू॒प॒ऽव्र॒स्काः । उ॒त । ये । यू॒प॒ऽवा॒हाः । च॒षाल॑म् । ये । अ॒श्व॒ऽयू॒पाय॑ । तक्ष॑ति । ये । च॒ । अर्व॑ते । पच॑नम् । स॒म्ऽभर॑न्ति । उ॒तो इति॑ । तेषा॑म् । अ॒भिऽगू॑र्तिः । नः॒ । इ॒न्व॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
यूपव्रस्का उत ये यूपवाहाश्चषालं ये अश्वयूपाय तक्षति। ये चार्वते पचनं सम्भरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु ॥

यूपऽव्रस्काः। उत। ये। यूपऽवाहाः। चषालम्। ये। अश्वऽयूपाय। तक्षति। ये। च। अर्वते। पचनम्। सम्ऽभरन्ति। उतो इति। तेषाम्। अभिऽगूर्तिः। नः। इन्वतु ॥ १.१६२.६

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (यूपव्रस्का) खभ्भे के लिये काष्ठ काटनेवाले (उत) और भी (ये) जो (यूपवाहाः) खभ्भे को प्राप्त करानेवाले जन (अश्वयूपाय) घोड़ों के बाँधने के लिये (चषालम्) किसी विशेष वृक्ष को (तक्षति) काटते हैं (वे, च) और जो (अर्वते) घोड़े के लिये (पचनम्) पकाने को (संभरन्ति) धारण करते और पुष्टि करते हैं, जो (तेषाम्) उनके बीच (उतो) निश्चय से (अभिगूर्त्तिः) सब ओर से उद्यमी है वह (नः) हम लोगों को (इन्वतु) प्राप्त होवे ॥ ६ ॥
Essence
जो मनुष्य घोड़े आदि पशुओं के बाँधने के लिये काठ के खभ्भे वा खूँटे करते बनाते हैं वा जो घोड़ों के राखन को पदार्थ दाना, घास, चारा, घुड़सार आदि स्वीकार करते बनाते हैं, वे उद्यमी होकर सुखों को प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।