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Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 5

191 Sukta
22 Mantra
1/162/5
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
होता॑ध्व॒र्युराव॑या अग्निमि॒न्धो ग्रा॑वग्रा॒भ उ॒त शंस्ता॒ सुवि॑प्रः। तेन॑ य॒ज्ञेन॒ स्व॑रंकृतेन॒ स्वि॑ष्टेन व॒क्षणा॒ आ पृ॑णध्वम् ॥

होता॑ । अ॒ध्व॒र्युः । आऽव॑याः । अ॒ग्नि॒म्ऽइ॒न्धः । ग्रा॒व॒ऽग्रा॒भः । उ॒त । शंस्ता॑ । सुऽवि॑प्रः । तेन॑ । य॒ज्ञेन॑ । सुऽअ॑रङ्कृतेन । सुऽइ॑ष्टेन । व॒क्षणाः॑ । आ । पृ॒ण॒ध्व॒म् ॥

Mantra without Swara
होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ उत शंस्ता सुविप्रः। तेन यज्ञेन स्वरंकृतेन स्विष्टेन वक्षणा आ पृणध्वम् ॥

होता। अध्वर्युः। आऽवयाः। अग्निम्ऽइन्धः। ग्रावऽग्राभः। उत। शंस्ता। सुऽविप्रः। तेन। यज्ञेन। सुऽअरङ्कृतेन। सुऽइष्टेन। वक्षणाः। आ। पृणध्वम् ॥ १.१६२.५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (होता) यज्ञ सिद्ध कराने (अध्वर्युः) अपने को नष्ट न होने की इच्छा करने (आवयाः) अच्छे प्रकार मिलने (अग्निमिन्धः) अग्नि को प्रकाशित करने (ग्रावग्राभः) प्रशंसकों को ग्रहण करने (उत) और (शंस्ता) प्रशंसा करनेवाला (सुविप्रः) सुन्दर बुद्धिमान् विद्वान् है (तेन) उसके साथ (स्विष्टेन) उत्तम चाहे और (स्वरङ्कृतेन) सुन्दर पूर्ण किये हुए (यज्ञेन) यज्ञकर्म से (वक्षणाः) नदियों को तुम (आ, पृणध्वम्) अच्छे प्रकार पूर्ण करो ॥ ५ ॥
Essence
सब मनुष्य दुर्गन्ध के निवारने और सुख की उन्नति के लिये यज्ञ का अनुष्ठान कर सर्वत्र देशों में सुगन्धित जलों को वर्षा कर नदियों को परिपूर्ण करें अर्थात् जल से भरें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।