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Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 22

191 Sukta
22 Mantra
1/162/22
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒गव्यं॑ नो वा॒जी स्वश्व्यं॑ पुं॒सः पु॒त्राँ उ॒त वि॑श्वा॒पुषं॑ र॒यिम्। अ॒ना॒गा॒स्त्वं नो॒ अदि॑तिः कृणोतु क्ष॒त्रं नो॒ अश्वो॑ वनतां ह॒विष्मा॑न् ॥

सु॒ऽगव्य॑म् । नः॒ । वा॒जी । सु॒ऽअश्व्य॑म् । पुं॒सः । पु॒त्रान् । उ॒त । वि॒श्वा॒ऽपुष॑म् । र॒यिम् । अ॒ना॒गाः॒ऽत्वम् । नः॒ । अदि॑तिः । कृ॒णो॒तु॒ । क्ष॒त्रम् । नः॒ । अश्वः॑ । व॒न॒ता॒म् । ह॒विष्मा॑न् ॥

Mantra without Swara
सुगव्यं नो वाजी स्वश्व्यं पुंसः पुत्राँ उत विश्वापुषं रयिम्। अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां हविष्मान् ॥

सुऽगव्यम्। नः। वाजी। सुऽअश्व्यम्। पुंसः। पुत्रान्। उत। विश्वाऽपुषम्। रयिम्। अनागाःऽत्वम्। नः। अदितिः। कृणोतु। क्षत्रम्। नः। अश्वः। वनताम्। हविष्मान् ॥ १.१६२.२२

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे यह (वाजी) वेगवान् अग्नि (नः) हमारे (सुगव्यम्) सुन्दर गौओं में हुए पदार्थ जिसमें हैं उसको (स्वश्व्यम्) सुन्दर घोड़ों में उत्पन्न हुए को (पुंसः) पुरुषत्ववाले (पुत्रान्) पुत्रों (उत) और (विश्वापुषम्) सबकी पुष्टि देनेवाले (रयिम्) धन को (कृणोत्) करे सो (अदितिः) अखण्डित न नाश को प्राप्त हुआ (नः) हमको (अनागास्त्वम्) पापपने से रहित (क्षत्रम्) राज्य को प्राप्त करे सो (हविष्मान्) मिले हैं होम योग्य पदार्थ जिसमें वह (अश्वः) व्याप्तिशील अग्नि (नः) हम लोगों को (वनताम्) सेवे, वैसे हम लोग इसको सिद्ध करें ॥ २२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पृथिवी आदि कि विद्या से गौ, घोड़े और पुरुष सन्तानों की पूरी पुष्टि और धन को संचित करके शीघ्रगामी अश्वरूप अग्नि की विद्या से राज्य को बढ़ाके निष्पाप होके सुखी होंवे औरों को भी ऐसे ही करें ॥ २२ ॥इस सूक्त में अश्वरूप अग्नि की विद्या का प्रतिपादन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ बासठवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।