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Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 19

191 Sukta
22 Mantra
1/162/19
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
एक॒स्त्वष्टु॒रश्व॑स्या विश॒स्ता द्वा य॒न्तारा॑ भवत॒स्तथ॑ ऋ॒तुः। या ते॒ गात्रा॑णामृतु॒था कृ॒णोमि॒ ताता॒ पिण्डा॑नां॒ प्र जु॑होम्य॒ग्नौ ॥

एकः॑ । त्वष्टुः॑ । अश्व॑स्य । वि॒ऽश॒स्ता । द्वा । य॒न्तारा॑ । भ॒व॒तः॒ । तथा॑ । ऋ॒तुः । या । ते॒ । गात्रा॑णाम् । ऋ॒तु॒ऽथा । कृ॒णोमि॑ । ताऽता॑ । पिण्डा॑नाम् । प्र । जु॒हो॒मि॒ । अ॒ग्नौ ॥

Mantra without Swara
एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः। या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ ॥

एकः। त्वष्टुः। अश्वस्य। विऽशस्ता। द्वा। यन्तारा। भवतः। तथा। ऋतुः। या। ते। गात्राणाम्। ऋतुऽथा। कृणोमि। ताऽता। पिण्डानाम्। प्र। जुहोमि। अग्नौ ॥ १.१६२.१९

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! (ते) तेरी विद्या और क्रिया से सिद्ध किये हुए (त्वष्टुः) बिजुलीरूप (अश्वस्य) व्याप्त अग्नि का (एकः) एक (ऋतुः) वसन्तादि ऋतु (विशस्ता) छिन्न-भिन्न करनेवाला अर्थात् भिन्न भिन्न पदार्थों में लगनेवाला और (द्वा) दो (यन्तारा) उसको नियम में रखनेवाले (भवतः) होते हैं (तथा) उसी प्रकार से (या) जो (गात्राणाम्) शरीरों के (ऋतुथा) ऋतु ऋतु में काम उनको और (पिण्डानाम्) अनेक पदार्थों में सङ्घातों के जो जो अङ्ग हैं (ताता) उन उन का काम में प्रयोग मैं (कृणोमि) करता हूँ और (अग्नौ) अग्नि में (प्र, जुहोमि) होमता हूँ ॥ १९ ॥
Essence
जो सब पदार्थों के छिन्न-भिन्न करनेवाले ऋतु के अनुकूल पाये हुए पदार्थों में व्याप्त बिजुलीरूप अग्नि के काल और सृष्टिक्रम नियम करनेवालों और प्रशंसित गुणों को जान अभीष्ट कामों को सिद्ध करते हुए मोटे-मोटे लक्कड़ आदि पदार्थों को आग में छोड़ बहुत कामों को सिद्ध करें, वे शिल्पविद्या को जाननेवाले कैसे न हों ? ॥ १९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।