Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 18

191 Sukta
22 Mantra
1/162/18
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चतु॑स्त्रिंशद्वा॒जिनो॑ दे॒वब॑न्धो॒र्वङ्क्री॒रश्व॑स्य॒ स्वधि॑ति॒: समे॑ति। अच्छि॑द्रा॒ गात्रा॑ व॒युना॑ कृणोत॒ परु॑ष्परुरनु॒घुष्या॒ वि श॑स्त ॥

चतुः॑ऽत्रिंशत् । वा॒जिनः॑ । दे॒वऽब॑न्धोः । वङ्क्रीः॑ । अश्व॑स्य । स्वऽधि॑तिः । सम् । ए॒ति॒ । अच्छि॑द्रा । गात्रा॑ । व॒युना॑ । कृ॒णो॒त॒ । परुः॑ऽपरुः । अ॒नु॒ऽघुष्य॑ । वि । श॒स्त॒ ॥

Mantra without Swara
चतुस्त्रिंशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ्क्रीरश्वस्य स्वधिति: समेति। अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या वि शस्त ॥

चतुःऽत्रिंशत्। वाजिनः। देवऽबन्धोः। वङ्क्रीः। अश्वस्य। स्वऽधितिः। सम्। एति। अच्छिद्रा। गात्रा। वयुना। कृणोत। परुःऽपरुः। अनुऽघुष्य। वि। शस्त ॥ १.१६२.१८

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जन ! तुम (देवबन्धोः) प्रकाशमान पृथिव्यादिकों के सम्बन्धी (वाजिनः) वेगवाले (अश्वस्य) शीघ्रगामी अग्नि की जो (स्वधितिः) बिजुली (समेति) अच्छे प्रकार जाती है उसको और (चतुस्त्रिंशत्) चौंतीस प्रकार की (वङ्क्रीः) टेढ़ी-बेढ़ी गतियों को (विशस्त) तड़काओ अर्थात् कलों को ताड़ना दे उन गतियों को निकालो। तथा (परुष्परुः) प्रत्येक मर्मस्थल पर (अनुघुष्य) अनुकूलता से कलायन्त्रों का शब्द कराकर (अच्छिद्रा) दो टूंक होने छिन्न-भिन्न होने से रहित (गात्रा) अङ्ग और (वयुना) उत्तम ज्ञान कर्मों को (कृणोत) करो ॥ १८ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस कारण से बिजुली उत्पन्न होती है, वह कारण सब पृथिव्यादिकों में व्याप्त है। इससे बिजुली की ताड़ना आदि से किसी का अङ्ग-भङ्ग न हो उतनी बिजुली काम में लाओ। जो अग्नि के गुणों को जानकर यथायोग्य क्रिया से उस अग्नि का प्रयोग किया जाय तो कौन काम न सिद्ध होने योग्य हों अर्थात् सभी यथेष्ट काम बनें ॥ १८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।