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Rigveda Mandal 1 / Sukta 162 / Mantra 15

191 Sukta
22 Mantra
1/162/15
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ताः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मा त्वा॒ग्निर्ध्व॑नयीद्धू॒मग॑न्धि॒र्मोखा भ्राज॑न्त्य॒भि वि॑क्त॒ जघ्रि॑:। इ॒ष्टं वी॒तम॒भिगू॑र्तं॒ वष॑ट्कृतं॒ तं दे॒वास॒: प्रति॑ गृभ्ण॒न्त्यश्व॑म् ॥

मा । त्वा॒ । अ॒ग्निः । ध्व॒न॒यी॒त् । धू॒मऽग॑न्धिः । मा । उ॒खा । भ्राज॑न्ती । अ॒भि । वि॒क्त॒ । जघ्रिः॑ । इ॒ष्टम् । वी॒तम् । अ॒भिऽगू॑र्तम् । वष॑ट्ऽकृतम् । तम् । दे॒वासः॑ । प्रति॑ । गृ॒भ्ण॒न्ति॒ । अश्व॑म् ॥

Mantra without Swara
मा त्वाग्निर्ध्वनयीद्धूमगन्धिर्मोखा भ्राजन्त्यभि विक्त जघ्रि:। इष्टं वीतमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवास: प्रति गृभ्णन्त्यश्वम् ॥

मा। त्वा। अग्निः। ध्वनयीत्। धूमऽगन्धिः। मा। उखा। भ्राजन्ती। अभि। विक्त। जघ्रिः। इष्टम्। वीतम्। अभिऽगूर्तम्। वषट्ऽकृतम्। तम्। देवासः। प्रति। गृभ्णन्ति। अश्वम् ॥ १.१६२.१५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जिस (इष्टम्) इष्ट अर्थात् जिससे यज्ञ वा सङ्ग किया जाता (वषट्कृतम्) जो क्रिया से सिद्ध किये हुए (वीतम्) व्याप्त होनेवाले (अभिगूर्त्तम्) सब ओर से उद्यमी (अश्वम्) घोड़े के समान शीघ्र पहुँचानेवाले बिजुलीरूप अग्नि को (देवासः) विद्वान् जन (त्वा) तुम्हें (प्रति, गृभ्णन्ति) प्रतीति से ग्रहण कराते हैं (तम्) उसको तुम ग्रहण करो, सो (धूमगन्धिः) धूम में गन्ध रखनेवाला (अग्निः) अग्नि (मा, ध्वनयीत्) मत् ध्वनि दे, मत बहुत शब्द दे और (भ्राजन्ती) प्रकाशमान (उखा) अन्न पकाने की बटलोई (जघ्रिः) अन्न गन्ध लेती हुई अर्थात् जिसके भीतर से भाफ उठ लौटके उसीमें जाती वह (मा, अभि, विक्त) मत अन्न को अपने में से सब ओर अलग करे, उगले ॥ १५ ॥
Essence
जो मनुष्य अग्नि वा घोड़े से रथों को चलाते हैं, वे लक्ष्मी से प्रकाशमान होते हैं। जो अग्नि में सुगन्धि आदि पदार्थों को होमते हैं, वे रोग और कष्ट के शब्दों से पीड्यमान नहीं होते हैं ॥ १५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।