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Rigveda Mandal 1 / Sukta 161 / Mantra 6

191 Sukta
14 Mantra
1/161/6
Devata- ऋभवः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्द्रो॒ हरी॑ युयु॒जे अ॒श्विना॒ रथं॒ बृह॒स्पति॑र्वि॒श्वरू॑पा॒मुपा॑जत। ऋ॒भुर्विभ्वा॒ वाजो॑ दे॒वाँ अ॑गच्छत॒ स्वप॑सो य॒ज्ञियं॑ भा॒गमै॑तन ॥

इन्द्रः॑ । हरी॑ । यु॒यु॒जे । अ॒श्विना॑ । रथ॑म् । बृह॒स्पतिः॑ । वि॒श्वऽरू॑पाम् । उप॑ । आ॒ज॒त॒ । ऋ॒भुः । विऽभ्वा॑ । वाजः॑ । दे॒वान् । अ॒ग॒च्छ॒त॒ । सु॒ऽअप॑सः । य॒ज्ञिय॑म् । भा॒गम् । ऐ॒त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो हरी युयुजे अश्विना रथं बृहस्पतिर्विश्वरूपामुपाजत। ऋभुर्विभ्वा वाजो देवाँ अगच्छत स्वपसो यज्ञियं भागमैतन ॥

इन्द्रः। हरी। युयुजे। अश्विना। रथम्। बृहस्पतिः। विश्वऽरूपाम्। उप। आजत। ऋभुः। विऽभ्वा। वाजः। देवान्। अगच्छत। सुऽअपसः। यज्ञियम्। भागम्। ऐतन ॥ १.१६१.६

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (इन्द्रः) बिजुली के समान परमैश्वर्यकारक सूर्य (हरी) धारण आकर्षण कर्मों की विद्या को (युयुजे) युक्त करे, (अश्विना) शिल्पविद्या वा उसकी क्रिया हथोटी के सिखानेवाले विद्वान् जन (रथम्) रमण करने योग्य विमान आदि ज्ञान को जोड़ें, (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े पदार्थों की पालना करनेवाले सूर्य के समान तुम लोग (विश्वरूपाम्) जिसमें समस्त अर्थात् छोटे, बड़े, मोटे, पतरे, टेढ़े, बकुचे, कारे, पीरे, रङ्गीले, चटकीले रूप विद्यमान हैं उस पृथिवी को (उप आजत) उत्तमता से जानो, (ऋभुः) धनञ्जय सूत्रात्मा वायु के समान मेधावी (विभ्वा) अपने व्याप्ति बल से (वाजः) अन्न को जैसे वैसे (देवान्) विद्वानों को (अगच्छत) प्राप्त होओ और (स्वपसः) जिनके सुन्दर धर्मसम्बन्धी काम हैं ऐसे हुए तुम (यज्ञियम्) जो यज्ञ के योग्य (भागम्) सेवन करने योग्य भोग है उसको (ऐतन) जानो ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली के समान कार्य को युक्त करने, शिल्पविद्या के समान सब कार्यों को यथायोग्य व्यवहारों में लगाने, सूर्य के समान राज्य को पालनेवाले, बुद्धिमानों के समान विद्वानों का सङ्ग करने और धार्मिक के समान कर्म करनेवाले मनुष्य हैं, वे सौभाग्यवान् होते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।