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Rigveda Mandal 1 / Sukta 161 / Mantra 12

191 Sukta
14 Mantra
1/161/12
Devata- ऋभवः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒म्मील्य॒ यद्भुव॑ना प॒र्यस॑र्पत॒ क्व॑ स्वित्ता॒त्या पि॒तरा॑ व आसतुः। अश॑पत॒ यः क॒रस्नं॑ व आद॒दे यः प्राब्र॑वी॒त्प्रो तस्मा॑ अब्रवीतन ॥

स॒म्ऽमील्य॑ । यत् । भुव॑ना । प॒रि॒ऽअस॑र्पत । क्व॑ । स्वि॒त् । तात्या । पि॒तरा॑ । वः॒ । आ॒स॒तुः॒ । अश॑पत । यः । क॒रस्न॑म् । वः॒ । आ॒ऽद॒दे । यः । प्र । अब्र॑वीत् । प्रो इति॑ । तस्मै॑ । अ॒ब्र॒वी॒त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
सम्मील्य यद्भुवना पर्यसर्पत क्व स्वित्तात्या पितरा व आसतुः। अशपत यः करस्नं व आददे यः प्राब्रवीत्प्रो तस्मा अब्रवीतन ॥

सम्ऽमील्य। यत्। भुवना। परिऽअसर्पत। क्व। स्वित्। तात्या। पितरा। वः। आसतुः। अशपत। यः। करस्नम्। वः। आऽददे। यः। प्र। अब्रवीत्। प्रो इति। तस्मै। अब्रवीतन ॥ १.१६१.१२

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्यार्थिजनो ! तुम (संमील्य) आँखें मिलमिला के (यत्) जो (भुवना) भूमि आदि लोक हैं उनको (पर्यसर्पत) सब ओर से जानो, तब (वः) तुम्हारे (तात्या) उस समय होनेवाले (पितरा) माता-पिता अर्थात् विद्याऽध्ययन समय के माता-पिता (क्व) (स्वित्) कहीं (आसतुः) निरन्तर बसें (यः) और जो (वः) तुम्हारी (करस्नम्) भुजा को (आददे) पकड़ता है वा जिसको (अशपत) अपराध हुए पर कोशो, (यः) जो आचार्य तुमको (प्र, अब्रवीत्) उपदेश सुनावे (तस्मै) उसके लिये (प्रो, अब्रवीतन) प्रिय वचन बोलो ॥ १२ ॥
Essence
जब पढ़ानेवालों के समीप विद्यार्थी आवें तब उनसे यह पूछना योग्य है कि तुम कहाँ के हो ? तुम्हारा निवास कहाँ है ? तुम्हारे माता-पिता का क्या नाम है ? क्या पढ़ना चाहते हो ? अखण्डित ब्रह्मचर्य करोगे वा न करोगे ? इत्यादि पूछ करके ही इनको विद्या ग्रहण करने के लिये ब्रह्मचर्य की शिक्षा देवें और शिष्य जन पढ़ानेवालों की निन्दा और उनके प्रतिकूल आचरण कभी न करें ॥ १२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।