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Rigveda Mandal 1 / Sukta 161 / Mantra 11

191 Sukta
14 Mantra
1/161/11
Devata- ऋभवः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒द्वत्स्व॑स्मा अकृणोतना॒ तृणं॑ नि॒वत्स्व॒पः स्व॑प॒स्यया॑ नरः। अगो॑ह्यस्य॒ यदस॑स्तना गृ॒हे तद॒द्येदमृ॑भवो॒ नानु॑ गच्छथ ॥

उ॒द्वत्ऽसु॑ । अ॒स्मै॒ । अ॒कृ॒णो॒त॒न॒ । तृण॑म् । नि॒वत्ऽसु॑ । अ॒पः । सु॒ऽअ॒प॒स्यया॑ । न॒रः॒ । अगो॑ह्यस्य । यत् । अस॑स्तन । गृ॒हे । तत् । अ॒द्य । इ॒दम् । ऋ॒भ॒वः॒ । न । अनु॑ । ग॒च्छ॒थ॒ ॥

Mantra without Swara
उद्वत्स्वस्मा अकृणोतना तृणं निवत्स्वपः स्वपस्यया नरः। अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो नानु गच्छथ ॥

उद्वत्ऽसु। अस्मै। अकृणोतन। तृणम्। निवत्ऽसु। अपः। सुऽअपस्यया। नरः। अगोह्यस्य। यत्। असस्तन। गृहे। तत्। अद्य। इदम्। ऋभवः। न। अनु। गच्छथ ॥ १.१६१.११

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) नेता अग्रगन्ता जनो ! तुम (स्वपस्यया) अपने को उत्तम काम की इच्छा से (अस्मै) इस गवादि पशु के लिये (निवत्सु) नीचे और (उद्वत्सु) ऊँचे प्रदेशों में (तृणम्) काटने योग्य घास को और (अपः) जलों को (अकृणोतन) उत्पन्न करो। हे (ऋभवः) मेधावी जनो ! तुम (यत्) जो (अगोह्यस्य) न लुकाय रखने योग्य के (गृहे) घर में वस्तु है (तत्) उसको (न)(असस्तन) नष्ट करो (अद्य) इस उत्तम समय में (इमम्) इसके (अनु, गच्छथ) पीछे चलो ॥ ११ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि ऊँचे-नीचे स्थलों में पशुओं के राखने के लिये जल और घास आदि पदार्थों को राखें और अरक्षित अर्थात् गिरे, पड़े वा प्रत्यक्ष में धरे हुए दूसरे के पदार्थ को भी अन्याय से ले लेने की इच्छा कभी न करें। धर्म, विद्या और बुद्धिमान् जनों का सङ्ग सदैव करें ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।