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Rigveda Mandal 1 / Sukta 160 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/160/5
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ते नो॑ गृणा॒ने म॑हिनी॒ महि॒ श्रव॑: क्ष॒त्रं द्या॑वापृथिवी धासथो बृ॒हत्। येना॒भि कृ॒ष्टीस्त॒तना॑म वि॒श्वहा॑ प॒नाय्य॒मोजो॑ अ॒स्मे समि॑न्वतम् ॥

ते । नः॒ । गृ॒णा॒ने इति॑ । म॒हि॒नी॒ इति॑ । महि॑ । श्रवः॑ । क्ष॒त्रम् । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । धा॒स॒थः॒ । बृ॒हत् । येन॑ । अ॒भि । कृ॒ष्टीः । त॒तना॑म । वि॒श्वहा॑ । प॒नाय्य॑म् । ओजः॑ । अ॒स्मे इति॑ । सम् । इ॒न्व॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
ते नो गृणाने महिनी महि श्रव: क्षत्रं द्यावापृथिवी धासथो बृहत्। येनाभि कृष्टीस्ततनाम विश्वहा पनाय्यमोजो अस्मे समिन्वतम् ॥

ते। नः। गृणाने इति। महिनी इति। महि। श्रवः। क्षत्रम्। द्यावापृथिवी इति। धासथः। बृहत्। येन। अभि। कृष्टीः। ततनाम। विश्वहा। पनाय्यम्। ओजः। अस्मे इति। सम्। इन्वतम् ॥ १.१६०.५

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (गृणाने) स्तुति किये जाते हुए (महिनी) बड़े (द्यावापृथिवी) भूमि और सूर्यलोक हैं (ते) वे (नः) हम लोगों के लिये (बृहत्) अत्यन्त (महि) प्रशंसनीय (श्रवः) अन्न और (क्षत्रम्) राज्य को (धासथः) धारण करें (येन) जिससे हम लोग (विश्वहा) सब दिनों (कृष्टीः) मनुष्यों का (अभि, ततनाम) सब ओर से विस्तार करें और उस (पनाय्यम्) प्रशंसा करने योग्य (ओजः) पराक्रम को (अस्मे) हम लोगों के लिये (समिन्वतम्) अच्छे प्रकार बढ़ावें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन भूमि के गुणों को जाननेवालों की विद्या को जानके उससे उपयोग करना जानते हैं, वे अत्यन्त बल को पाकर सब पृथिवी का राज्य कर सकते हैं ॥ ५ ॥इस सूक्त में द्यावापृथिवी के दृष्टान्त से मनुष्यों का यह उपकार ग्रहण करना कहा, इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये ॥यह एकसौ साठवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।