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Rigveda Mandal 1 / Sukta 160 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/160/4
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒यं दे॒वाना॑म॒पसा॑म॒पस्त॑मो॒ यो ज॒जान॒ रोद॑सी वि॒श्वश॑म्भुवा। वि यो म॒मे रज॑सी सुक्रतू॒यया॒जरे॑भि॒: स्कम्भ॑नेभि॒: समा॑नृचे ॥

अ॒यम् । दे॒वाना॑म् । अ॒पसा॑म् । अ॒पःऽत॑मः । यः । ज॒जान॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । वि॒श्वऽश॑म्भुवा । वि । यः । म॒मे । रज॑सी॒ इति॑ । सु॒क्र॒तु॒ऽयया॑ । अ॒जरे॑भिः । स्कम्भ॑नेभिः । सम् । आ॒नृचे ॥

Mantra without Swara
अयं देवानामपसामपस्तमो यो जजान रोदसी विश्वशम्भुवा। वि यो ममे रजसी सुक्रतूययाजरेभि: स्कम्भनेभि: समानृचे ॥

अयम्। देवानाम्। अपसाम्। अपःऽतमः। यः। जजान। रोदसी इति। विश्वऽशम्भुवा। वि। यः। ममे। रजसी इति। सुक्रतुऽयया। अजरेभिः। स्कम्भनेभिः। सम्। आनृचे ॥ १.१६०.४

Ashtak » 2 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (अयम्) यह (देवानाम्) पृथिवी आदि लोकों के (अपसाम्) कर्मों के बीच (अपस्तमः) अतीव क्रियावान् है वा (यः) जो (विश्वशम्भुवा) सब में सुख की भावना करानेवाले कर्म से (रोदसी) सूर्यलोक और भूमिलोक को (जजान) प्रकट करता है वा (यः) जो (सुक्रतूयया) उत्तम बुद्धि, कर्म और (स्कम्भनेभिः) रुकावटों से और (अजरेभिः) हानिरहित प्रबन्धों के साथ (रजसी) भूमिलोक और सूर्यलोक का (वि, ममे) विविध प्रकार से मान करता उसकी मैं (समानृचे) अच्छे प्रकार स्तुति करता हूँ ॥ ४ ॥
Essence
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने आदि काम जिस जगदीश्वर के होते हैं, जो निश्चय के साथ कारण से समस्त नाना प्रकार के कार्य को रचकर अनन्त बल से धारण करता है, उसीको सब लोग सदैव प्रशंसित करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।